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मंडी शिफ्ट करना ही मंजूर नहीं आइएसबीटी तो भूल ही जाओ

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हल्द्वानी। अभी अंतरराज्यीय बस अड्डे का मामला ठंडा नहीं हो पाया था कि अब प्रदेश सरकार द्वारा हल्द्वानी मंडी को कहीं ओर शिफ्ट करने का प्रस्ताव तैयार किए जाने को लेकर मंडी व्यापारी भड़क गए हैं। मंगलवार को आलू फल आढ़ती व्यापारी एसोसिएशन ने ऐलान किया कि अगर सरकार ने मंडी शिफ्ट करने जैसा कोई कदम उठाया तो प्रदेश भर की मंडियों में तालाबंदी कर दी जाएगी।
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थोक मंडी में आलू फल आढ़ती व्यापारी एसोसिएशन के कार्यालय में मंगलवार को प्रेसवार्ता में एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कहा कि उन्होंने 35 वर्षों की मेहनत से हल्द्वानी मंडी को आबाद किया है। इस मंडी से उनकी भावनाएं जुड़ी हैं अगर इसे हिलाने की कोशिश की गई तो व्यापारी चुप नहीं बैठेगा। अध्यक्ष जीवन सिंह कार्की एवं देवानंद सिंधी ने बताया कि वर्ष 1975 में हल्द्वानी मंडी का शिलान्यास हुआ था तथा 1982 में इसमें कारोबार शुरू हो गया था। जिस समय आलू फल व्यापारी शिफ्ट हुए थे तब यहां जंगल ही था, अब आबादी होने पर इसे हटाने की साजिश की जा रही है। उन्होंने मुख्यमंत्री से सवाल किया है कि जब गौलापार में चयनित स्थान पर श्मशान की भूमि बताकर आईएसबीटी नहीं बन सकता तो क्या वहां मंडी के व्यापारी बैठेंगे। उन्होंने कहा कि हल्द्वानी मंडी राज्य गठन से पूर्व भी सबसे बड़ी मंडी थी और उत्तराखंड बनने के बाद भी 26 मंडियों में सबसे बड़ी ही है, यहां अंतरराज्यीय बस अड्डा बनाए जाने का क्या औचित्य है। प्रांतीय उद्योग व्यापार मंडल के जिलाध्यक्ष विपिन गुप्ता और मंडी व्यवसायियों ने कहा कि व्यापारी सरकार के इस तुगलकी फरमान का विरोध कर मुंह तोड़ जवाब देंगे। धरना प्रदर्शन, रास्ता जाम, घेराव से लेकर मंडी में तालाबंदी आंदोलन किए जाएंगे। इस दौरान रमेश चंद्र जोशी, भूपाल सिंह, गोपाल सिंह देवलिया, गोविंद राम साहनी, कैलाश चंद्र जोशी, सज्जाद अली, कैशव दत्त पलडिया आदि मौजूद थे।

मंडी विस्तार तक के लिए नहीं मिली थी जमीन
तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान हल्द्वानी मंडी के विस्तार तक के लिए जंगलात की जमीन नहीं मिल पाई थी तो अब मंडी शिफ्ट करने के प्रस्ताव पर वर्तमान भाजपा सरकार को जंगलात की भूमि कैसे मिल सकेगी, इसको लेकर भी सवाल पैदा हो गए हैं। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, तीनपानी के पास स्थित जंगलात की करीब 25 एकड़ भूमि हस्तांतरण का प्रस्ताव हल्द्वानी मंडी विस्तार के मंडी परिषद की ओर से शासन को भेजा गया था। तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ. इंदिरा हृदयेश और मंडी सभापति सुमित हृदयेश ने व्यवसायियों को खुश करने के मकसद से इस प्रोजेक्ट के लिए पूरा जोर भी लगाया। करीब दो वर्ष पहले शासन से वनभूमि हस्तांतरण का प्रस्ताव केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के पास पहुंचा तो उसे इस तर्क के साथ रिजेक्ट कर दिया गया था कि आरक्षित वन भूमि किसी भी व्यवसायिक कार्य के लिए नहीं दी जा सकती। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय से वन भूमि हस्तांतरण में समस्या आने के बाद मंडी विस्तार की योजना ही ठंडे बस्ते में डाल दी गई थी।
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