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जमरानी बांध बना तो नहीं रहेगी पेयजल की किल्लत

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हल्द्वानी। तराई भाबर की लाइफ लाइन कही जाने वाले जमरानी बांध पर आखिरकार उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच सहमति बन ही गई। इन 43 वर्षों में जमरानी बांध परियोजना की फाइल कई बार उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड और केंद्र सरकार के बीच फुटबाल बनती रही। 63.25 करोड़ रुपये से शुरू हुई परियोजना की लागत करीब 2350 करोड़ रुपये होने के बाद मंजूरी मिल पाई है।
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हल्द्वानी की पेयजल समस्या के समाधान के लिए क्षेत्रवासी लंबे समय तक जमरानी बांध के लिए आंदोलन कर चुके हैं। जमरानी बांध आंदोलन ने ही बंशीधर भगत को विधानसभा तक पहुंचाया था। क्षेत्रवासियों की लंबी मांग के बाद प्रदेश सरकार ने वर्ष 1975 में जमरानी बांध को सैद्धांतिक स्वीकृति देते हुए 63.25 करोड़ रुपये की राशि जारी की। इससे गौला बैराज, चार सौ किमी नहरों का निर्माण और दमुवाढूंगा में जमरानी बांध परियोजना दफ्तर और कर्मचारी आवासों का निर्माण किया गया। बांध परियोजना को सैद्धांतिक स्वीकृति मिलने के बाद सिंचाई विभाग ने इसकी डीपीआर तैयार शासन को भेजी। बांध परियोजना पर केंद्रीय वन एवं पर्यावरण की आपत्तियों के कारण इसे मंजूरी नहीं मिल पाई। सिंचाई विभाग ने सैकड़ों बार आपत्तियों का निस्तारण किया और बार-बार फाइलें केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजी जाती रहीं।
361 हेक्टेयर भूमि में बनने वाले करीब 130 मीटर ऊंचे और 480 मीटर चौड़े नौ किमी लंबे जमरानी बांध में 143 मिलियन घन मीटर पानी उपलब्ध होगा। इसमें से 61 मिलियन घन मीटर पानी उत्तरप्रदेश को मिलेगा। बांध से हल्द्वानी की पेयजल व्यवस्था के अलावा तराई, भाबर और उत्तर प्रदेश को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सकेगा। बांध में मत्स्य पालन, नैकायन भी किया किया जाएगा। जमरानी बांध से 27 मेगावाट बिजली उत्पादन का भी प्रस्ताव है।
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खनन पर पड़ेगा विपरीत प्रभाव
जमरानी बांध बनने से जहां क्षेत्र की लाखों की आबादी को पेयजल और सिंचाई के लिए पानी मिल सकेगा वहीं खनन से जुड़े कारोबारियों को नुकसान होने की संभावना है। बांध बन जाने के बाद गौला में खनन की संभावनाएं लगभग समाप्त हो जाएंगी जिससे हजारों लोगों की रोजीरोटी पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।
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