फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राजकीय होने के आठ वर्ष बाद भी नहीं सुधरी व्यवस् थाएं

विज्ञापन
विज्ञापन
हल्द्वानी। उत्तराखंड में सरकारें भले ही बदली हों मगर स्वास्थ्य व्यवस्थाओं में अमूल चूल परिवर्तन नहीं आया। मुख्यमंत्री के पास स्वास्थ्य और चिकित्सा-शिक्षा विभाग होने के बावजूद भी एसटीएच की व्यवस्थाएं बदहाल हैं। ट्रस्ट के समय भी 2010 में बच्चों की मौत हुई थी। अस्पताल का राजकीयकरण हुआ मगर आठ वर्षों भी हालात जस के तस हैं।
विज्ञापन

कुमाऊं के सबसे बड़े सुशीला तिवारी अस्पताल के खाते में गिनाने के लिए उपलब्धियां कम हैं और अव्यवस्थाओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है। एसटीएच की नींव रखने वाले पूर्व सीएम एनडी तिवारी भी अव्यवस्थाओं के खिलाफ धरने पर बैठे थे मगर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कोरे आश्वासन देकर अनशन और मौन व्रत खत्म करा दिया था। बावजूद इसके व्यवस्थाएं ठीक नहीं हुई। आज तक एसटीएच में कैथ लैब और न्यूरो सर्जन की व्यवस्था नहीं है। साथ ही डाक्टरों की कमी से अस्पताल के कई विभाग जूझ रहे हैं। मंडलायुक्त ने भी एसटीएच और राजकीय मेडिकल कालेज में नौ घंटे तक निरीक्षण करने के साथ ही नसीहतें दी थीं मगर उसका भी कोई असर दिखाई नहीं पड़ रहा है।

एनआईसीयू में एक वर्ष में 151 मौत
हल्द्वानी। एनआईसीयू में एक वर्ष के भीतर 151 बच्चों की मौत हो चुकी है। राजकीय मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. सीपी भैसोड़ा ने बताया कि एक जून 17 से एक जुलाई 18 तक इलाज के लिए 19 सौ से अधिक बच्चे आए और 151 की मौत हो गई।
विज्ञापन


एनआईसीयू में है 24 बेड, बुधवार सभी फुल
हल्द्वानी। बाल रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय आर्या का कहना है कि बुधवार को एनआईसीयू में सभी 24 बेड फुुल थे। चार नवजात में दो को एनआईसीयू की जरूरत थी मगर उन्हें एनआईसीयू में नहीं रखा जा सका था। डॉ. आर्या ने बताया कि एनआईसीयू में 20 बेड और बढ़ाए जा रहे हैं। विस्तारीकरण और उपकरण की खरीद पर लगभग तीस लाख रुपये खर्च होगा।

एक बेड पर थी दो महिलाएं, हो सकता है संक्रमण
हल्द्वानी। स्त्री एवं प्रसूति रोग वार्ड की हालत यह थी कि एक बेड पर दो महिलाओं को रखा गया था। ऐसे में संक्रमण फैलने का खतरा भी रहता है। सूत्रों की मानें तो वार्ड में अकसर ही ऐसी हालत रहती है। चार नवजात की मौत होने के बावजूद अस्पताल प्रशासन नहीं चेता। 90 बेड होने के बावजूद एक बेड पर दो महिलाओं को रखा गया था।

वार्ड के बाहर नहीं चलते हैं पंखे न जलती है लाइट
हल्द्वानी। मरीजों को लेकर आने वाले तीमारदार वार्ड के बाहर इंतजार करते हैं और आराम भी कर लेते हैं। सूत्रों की मानें तो वार्ड के बाहर की जगह में न तो पंखे चलते हैं और न ही लाइट जलती हैं। पंखे और लाइट के कनेक्शन हटवा दिए गए हैं जबकि वार्ड के बाहर कई बार पानी फेंक दिया जाता है और लोग गिरकर चोटिल होते हैं।

भीड़ हटवाई और मांगा जा रहा था पास
हल्द्वानी। स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में हंगामा होने के बाद गार्डों से जबरन भीड़ हटवाई गई। साथ ही आने जाने वालों से पास मांगा जा रहा था। आलम यह हो गया कि मीडिया कर्मियों को भी जाने से रोक दिया गया और कहा गया कि एमएस से लिखित अनुमति लेकर आएं। सुरक्षा में तैनात गार्ड मीडिया कर्मियों से उनके आई कार्ड मांग रहे थे।

पांच काल के बाद भी नहीं आई 108
हल्द्वानी। खटीमा बग्गा चौवन निवासी संजय ने बताया कि भाभी प्रभावती को अस्पताल लाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ी। 108 एंबुलेंस को पांच बार फोन किए उसके बावजूद 108 नहीं आई। निजी वाहन से लेकर भाभी को अस्पताल आना पड़ा।

नौ घंटे बाद पहुंचा एक सिपाही
हल्द्वानी। सुशीला तिवारी अस्पताल में बुधवार की रात हंगामा हो रहा था। नवजात की मौत के बाद मामले की सूचना पुलिस को दी गई। परिजनों का आरोप था कि रात लगभग तीन बजे सूचना दी थी मगर कोई पुलिस कर्मी नहीं पहुंचा। बृहस्पतिवार दोपहर 12 बजे यानी नौ घंटे बाद एक सिपाही पहुंचा।

ओखलकांडा से आई मरीज का बच्चा पेट में ही मर चुका था और बाहर आ गया था। जबकि कोटाबाग के मरीज के साथ आई महिला को बताया गया था कि बच्चा पेट में मर चुका है। आठ माह का बच्चा था और वजन महज 900 ग्राम था। पति के मौजूद न होने के कारण उसे जानकारी नहीं दी गई थी। हल्दूचौड़ के मरीज का बच्चा बहुत बीमार था और वजन भी कम था। खटीमा के प्रकरण पर मुझे कोई जानकारी नहीं है।
डॉ. अशोक कुमार, कार्यवाहक एमएस, एसटीएच

सात माह में 181 बच्चे और 42 महिलाओं की मौत
हल्द्वानी। स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. टीसी पंत ने बताया कि पहली जनवरी से 31 जुलाई 2018 तक कुमाऊं में 44,815 प्रसव हुए। इनमें 37,703 नार्मल और 7,112 सर्जरी के शामिल हैं। उन्होंने बताया कि सात माह में 181 बच्चों की मौत हुई जबकि 42 प्रसूताओं ने दम तोड़ा

अस्पताल में मरने के लिए नहीं भेजेंगे मरीज : इंदिरा
हल्द्वानी। नेता प्रतिपक्ष डॉ. इंदिरा हृदयेश ने एसटीएच की बदहाली को लेकर सरकार पर हल्ला बोलते हुए कहा कि एसटीएच में मरीजों को मरने के लिए नहीं भेजेंगे। सरकार सिर्फ बातें कर रही है और धरातल पर कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा है। इस मामले को मुख्यमंत्री के संज्ञान में लाया जाएगा। साथ ही क्षेत्रीय विधायक होने के नाते लोगों को साथ जोड़कर व्यवस्थाएं दुरुस्त करने के लिए आंदोलन चलाया जाएगा।
विज्ञापन


एसटीएच में कब-कब हुई घटनाएं
= 14 अप्रैल 2015 : पत्रकार की पत्नी की इलाज में लापरवाही से मौत, हंगामा।
= 19 अप्रैल 2015 : नवजात बच्ची की मौत, हंगामा।
= 20 अप्रैल 2015 : नवजात बच्ची की मौत, हंगामा।
= 02 अक्तूबर 2015 : तीमारदारों ने डाक्टरों को पीटा और इलाज में लगाया लापरवाही का आरोप।
= 01 अप्रैल 2014 : दिल के रोगी की मौत पर हंगामा।
= 09 जुलाई 2014 : प्रसव के दौरान बच्चे की मौत के बाद मां की जान बचाने के लिए यूटरस निकाला।
= 15 दिसंबर 2013 : बीजीपी नेता की मौत के बाद हंगामा।
= 05 सितंबर 2012 : बरेली रोड निवासी एक व्यक्ति की मौत के बाद बवाल।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें