हल्द्वानी। कारगिल युद्ध में दुश्मनों के दांत खट्टे करने वाले शहीद मोहन सिंह को शहर के नागरिकों ने याद किया। शनिवार को श्रद्धांजलि सभा में वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड के इस लाल की शहादत को कभी भुलाया नहीं जा सकता है।
जिला सैनिक कल्याण अधिकारी मेजर बीएस रौतेला के अनुसार बागेश्वर जिले के कर्मी गांव निवासी मोहन सिंह ने राजकीय इंटर कालेज चौड़ास्थल से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की। वह 31 दिसंबर 90 को सेना में भर्ती हुए। प्रशिक्षण के बाद मोहन सिंह को दो नागा रेजीमेंट में भेजा गया। जुलाई 1999 में कारगिल का युद्ध छिड़ने पर मोहन सिंह ने मोस्को घाटी स्थित 4875 की चोटी को कब्जा करने के लिए अपनी पलटन के साथ धावा बोला।
पहाड़ी पर कब्जा करते समय दुश्मनों ने नायक मोहन सिंह पर मशीनगन और मोर्टार से हमला कर दिया। छह जुलाई 1999 को कुमाऊं के लाल ने वीरगति प्राप्त की। मोहन सिंह की बहादुरी को देखते हुए उन्हें मरणोपरांत सेना के वीरता पदक से सम्मानित किया गया। इस चोटी को जीतने के बाद भारत की विजय का रास्ता साफ हो गया था।
शनिवार को जिला सैनिक कल्याण विभाग के कार्यालय में शहीद को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। इस मौके पर शहीद की वीरांगना उमा देवी अपने बच्चों के साथ मौजूद थी।