हल्द्वानी। जमरानी बांध स्थल और डीपीआर का परीक्षण करने के बाद केंद्रीय जलायोग की टीम बुधवार को दिल्ली लौट गई है। टीम ने बांध को जल्द मंजूरी मिलने के संकेत दिए हैं। केंद्रीय टीम के दौरे के बाद अब जमरानी बांध का बनना तय हो गया है।
केंद्रीय जलायोग के मुख्य अभियंता सीकेएल दास के नेतृत्व में तीन सदस्यीय टीम ने जमरानी बांध की संभावनाओं को लेकर दो दिन तक यहां विभिन्न पहलुओं की जानकारी जुटाई और मानकों का परीक्षण किया। केंद्रीय टीम ने जमरानी बांध स्थल, वहां बने टनलों, गौला बैराज, पेयजल ट्रीटमेंट प्लांट, भीमताल, सातताल और नौकुचियाताल का निरीक्षण किया। मुख्य अभियंता दास ने कहा कि जमरानी बांध सभी मानकों को पूरा करता है। केंद्रीय एडवाइजरी कमेटी को निरीक्षण और परीक्षण की विस्तृत रिपोर्ट सौंपी जाएगी। एडवाइजरी कमेटी की संस्तुति के बाद जमरानी बांध को मंजूरी मिल जाएगी। सिंचाई विभाग के मुख्य अभियंता एलके शर्मा ने कहा कि केंद्रीय टीम पूरी तरह संतुष्ट है। टीम ने अपनी ओर से बांध के लिए हरी झंडी दे दी है। एडवाइजरी कमेटी की औपचारिक मोहर लगना शेष है। टीम में केंद्रीय जलायोग के निदेशक पीयूष रंजन, निदेशक एसएस बोनाल, डीसी टम्टा एसई, एमएस पतियाल एसई, डीसी पांडे एसई, जावेद अनवर ईई, तरुण बंसल ईई, संजय कुमार एई, शाह नवाज आदि थे।
भीमताल, नौकुचियाताल एवं सातताल की झीलों का किया निरीक्षण
भीमताल (नैनीताल)। जमरानी बांध की संभावना को देखते हुए केंद्रीय जलायोग की टीम ने बुधवार को भीमताल, सातताल, नौकुचियाताल की झीलों का निरीक्षण किया। केंद्रीय जलायोग के मुख्य अभियंता सीकेएल दास के नेतृत्व में पहुंची टीम ने भीमताल डैम और झील का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान सीकेएल दास द्वारा सिंचाई विभाग के अधिकारियों से मैदानी क्षेत्रों में पानी छोड़ने के बारे में विस्तृत रुप से जानकारी ली। इस दौरान अधीक्षण अभियंता डीसी टम्टा, एसई एमएस पतियाल, ईई जावेद अनवर, ईई हरीश चंद्र भारती, एई शाह नवाज, एई संजय कुमार, एई नागेश पपनै, एई डीसी पंत, जेई प्रमोद कुमार, जेई सुजाता हर्बोला आदि मौजूद रहे।
जमरानी बांध की आपत्तियों का निस्तारण करने में लगे 43 साल
हल्द्वानी। तराई भाबर की लाइफ लाइन कही जाने वाली जमरानी बांध को लेकर क्षेत्रवासियों ने व्यापक आंदोलन किया था। जन दबाव को देखते हुए जमरानी बांध का प्रस्ताव तैयार किया गया। जमरानी बांध परियोजना तमाम आपत्तियों के चलते 43 साल तक केंद्र और राज्य के बीच झूलती रही। अब केंद्रीय जलायोग की टीम के बांध स्थल परीक्षण और डीपीआर पर सहमति के बाद बांध की मंजूरी के सभी रास्ते प्रशस्त हो गए हैं। बांध परियोजना को केंद्रीय सलाहकार समिति की स्वीकृति मिलनी शेष है।
सिंचाई विभाग ने 1970 में जमरानी बांध का प्रस्ताव सरकार को भेजा गया। 1975 में जमरानी बांध परियोजना को सैद्धांतिक सहमति मिली और परियोजना के लिए तत्कालीन लागत 61.25 करोड़ रुपये मंजूर किए गए। जमरानी बांध परियोजना के तहत गौला बैराज, 244 किमी नहरों और जमरानी कालोनी का निर्माण किया गया। इसमें करीब 25.24 करोड़ रुपये खर्च हुई। 1975 से जमरानी बांध परियोजना केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की तमाम आपत्तियों के कारण स्वीकृत नहीं हो पाई। बांध की स्वीकृति में पर्यावरणीय आपत्ति के अलावा वन क्षेत्र का हस्तांतरण, वन्यजीव जंतु, प्रभावित होने वाली वनस्पति फ्लोराफोना, बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले परिवारों के विस्थापन, बांध स्थल से प्रभावित होने वाली वन भूमि में आने वाले पेड़ों की भरपाई आदि थे। बांध क्षेत्र में आ रहे पेड़ों की भरपाई तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने हरदोई में कर दी थी। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की तमाम आपत्तियों के निस्तारण के बाद वर्ष 2000 में अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद उत्तरप्रदेश में जल बंटवारे को अपनी आपत्ति लगा दी। राज्य बनने के बाद उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच जल बंटवारे पर खींचतान शुरू हो गई। बांध परियोजना से पेयजल से बचे पानी में उत्तरप्रदेश को सिंचाई के लिए 52 फीसदी और उत्तराखंड राज्य को 48 फीसदी पानी देने का प्रस्ताव किया गया। उत्तरप्रदेश सरकार ने जल बंटवारे पर आपत्ति लगा दी। उत्तरप्रदेश ने सिंचाई के लिए 72 फीसदी पानी की शर्त लगा दी। अंतत: उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड में 62 फीसदी और 38 फीसदी सिंचाई के पानी पर सहमति होने के बाद उत्तरप्रदेश ने पिछले साल नवंबर में एमओयू में हस्ताक्षर कर दिए। उत्तरप्रदेश से जल बंटवारे पर सहमति होने के बाद जमरानी बांध परियोजना की 2850 करोड़ रुपये की डीपीआर केंद्रीय जलायोग को भेजी गई। केंद्रीय जलायोग ने जमरानी बांध परियोजना की मौजूदा डीपीआर के परीक्षण के बाद बांध स्थल का निरीक्षण करने के बाद बांध की मंजूरी के सकारात्मक संकेत दिए हैं। टीम के दौरे के बाद बांध परियोजना को मंजूरी मिलना तय माना जा रहा है।
भाबर की लाइफ लाइन है जमरानी बांध परियोजना
हल्द्वानी। तराई भाबर की लाइफ लाइन कही जाने वाली जमरानी बांध के बन जाने के बाद हल्द्वानी और आसपास के क्षेत्र की जनता को पर्याप्त पेयजल मिलेगा। इसके साथ ही उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के तराई को सिंचाई को भरपूर पानी मिलेगा। जमरानी बांध का प्रमुख उद्देश्य क्षेत्र की पेयजल समस्या को दूर करना है। वर्तमान में सालभर क्षेत्र में पेयजल संकट बना रहता है। पेयजल किल्लत को देखते हुए ही जमरानी बांध की मांग की गई थी। बांध के बन जाने पर 42 मिलियन क्यूबिक मीटर (एमसीएम) पानी शुद्ध पेयजल मिलेगा। इसके साथ ही उत्तरप्रदेश को 61 एमसीएम और उत्तराखंड को 38.6 एमसीएम पानी सिंचाई के लिए मिलेगा।
पर्यटन गतिविधियों का होगा विकास
नौकायन, मत्स्य पालन का भी है प्रस्ताव
हल्द्वानी। जमरानी बांध का निर्माण होने के बाद यह स्थल पर्यटन के मानचित्र पर भी विशेष स्थान बनाएगा। बांध बनने से पर्यटन गतिविधियों का विकास होने से रोजगार के अवसर बढे़ंगे। बांध से नौकायन और मत्स्य पालन का भी प्रस्ताव है। जमरानी बांध का निर्माण होने के क्षेत्र में पर्यटन गतिविधियों के विकसित होने से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। सिंचाई विभाग ने पर्यटन के साथ ही नौकायन और मत्स्य पालन का भी प्रस्ताव बनाया है। नौकायन और मत्स्य पालन से स्थानीय लोग अच्छा रोजगार प्राप्त कर सकेंगे। जिले में हर वर्ष लाखों पर्यटक आते हैं। पर्यटन मानचित्र में जमरानी के जुड़ जाने से यहां आने वाले पर्यटक सैर सपाटे के अलावा नौकायन का भी लाभ लेंगे।
जमरानी बांध परियोजना में मत्स्य पालन, नौकायन, बिजली उत्पादन का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा इससे पर्यटन गतिविधियां विकसित किए जाने की अपार संभावनाएं हैं। बांध से जहां क्षेत्र की पेयजल और सिंचाई व्यवस्थाएं पूरी होंगी वहीं पर्यटन के माध्यम से स्थानीय युवाओं को अच्छा रोजगार मिलेगा।
- एलके शर्मा, मुख्य अभियंता (उत्तर) सिंचाई विभाग।