हल्द्वानी। वन मंत्री हरक सिंह रावत अपनी हनक के लिए भी जाने जाते हैं। एक ठेकेदार के मामले में हरक की इस हनक की या तो वन निगम को परवाह नहीं है या वन मंत्री खुद नरम होना स्वीकार कर रहे हैं। वन निगम का हाल यह है कि ई रवन्ना जारी करने के लिए इंटरनेट के इंतजाम में मनचाहे ठेकेदार को नंधौर नदी में तो अयोग्य करार दिया जबकि उसी ठेकेदार को गौला में सेवाएं देने से नहीं रोका जा रहा है।
तत्कालीन हरीश रावत सरकार ने उप खनिज निकासी के लिए ई रवन्ना सिस्टम लागू किया था। गौला में ई रवन्ना चालू करने के लिए इंटरनेट का जिम्मा दो साल की अवधि के लिए ओम गुरु ट्रेडर्स को दिया गया था। इस साल नंधौर नदी में खनन के ई रवन्ना के लिए इंटरनेट की निविदाएं आमंत्रित की गईं। यहां भी इंटरनेट का जिम्मा लगभग ओम गुरु ट्रेडर्स को ही मिलने वाला था कि ऐन मौके पर बाहर की गई कंपनी आंजने इंफार्मेटिक्स ने विरोध जताया था। कंपनी का कहना था कि इंटरनेट टावर लगाने के लिए डिपार्टमेंट आफ टेलीकाम से एक लाइसेंस की जरूरत होती है जो ओम गुरु के पास नहीं है। ओम गुरु ट्रेडर्स का दावा था कि रुद्रपुर की एक कंपनी के पास यह लाइसेंस है और वह उसकी चैनल पार्टनर हैं। ट्रेडर्स के पास लाइसेंस नहीं था इसलिए वन निगम ने निविदा निरस्त कर दी थी।
हद तो यह है कि यही ओम गुरु ट्रेडर्स गौला में इंटरनेट की सेवाएं दे रहा हैं। पिछली साल भी ट्रेडर्स ने गौला में इंटरनेट सेवाएं दी और इस साल भी देगा। अब सवाल यह है कि जब ओम गुरु नंधौर के लिए योग्य नहीं है तो गौला में सेवाएं किस आधार पर दे रहा है। क्या गौला में इंटरनेट टावर लगाने के लिए डॉट लाइसेंस की अनिवार्यता नहीं है? क्या नंधौर और गौला नदी में केंद्र व राज्य सरकार के मानक अलग अलग है? अगर नहीं तो उच्च न्यायालय में धर्मकांटा विचाराधीन होने के बाद भी निगम ने संबंधित ठेकेदार को एक भी नोटिस जारी नहीं किया। बुधवार को वन मंत्री हरक सिंह यहां आ भी रहे है। हरक वन निगम के अध्यक्ष भी हैं। हरक यह देख पाएंगे यह अब बुधवार को ही साफ होगा।
इंटरनेट सेवा देने के लिए अनिवार्य है डॉट का लाइसेंस
किसी भी प्रकार की इंटरनेट सेवा देने के लिए डिपार्टमेंट आफ टेलीकाम का लाइसेंस अनिवार्य होता है इसमें रेडियो फ्रीक्वेंसी टावर वगैरह लगाने की अनुमति दी जाती है। बिना इस अनुमति के इंटरनेट मुहैया कराने पर ऐसा करने वाले के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का भी प्रावधान है।
धर्मकांटा नीति, इंटरनेट नीति को नहीं करते सार्वजनिक
हल्द्वानी। वन निगम में इस कदर गड़बड़झाला है कि वर्ष 2006 में बनी धर्मकांटा नीति, 2016 में इंटरनेट इंतजाम के लिए बनी नीति व शर्ते, 2014-15 में बने आरएफआईडी चिप के मानक व शर्तों को भी सार्वजनिक नहीं किया जाता है ताकि नियमों का ताक पर रखकर मनमाने ढंग से बंदरबाट की जाए।