हल्द्वानी। विकास योजनाओं के लिए वन भूमि की अब खासी कीमत अदा करनी होगी। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने लागत लाभ विश्लेषण (कास्ट बेनिफिट एनालिसिस) के लिए नए दिशा निर्देश जारी किए हैं। नए निर्देशों के तहत अब वन भूमि का अधिग्रहण मूल्य भी चुकाना होगा। यह मूल्य संबंधित वन भूमि से सटे इलाकों की भूमि का बाजार मूल्य या सर्किल रेट का तीस प्रतिशत होगा। दो अगस्त के बाद के सभी प्रस्तावों के लिए ये निर्देश लागू किए गए हैं।
नए निर्देश के मुताबिक अब पहाड़ में पांच व मैदान में 20 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि हस्तांतरण में भूमि हस्तांतरण से होने वाले नफा नुकसान का भी आकलन किया जाएगा। इसी आकलन के आधार पर भूमि हस्तांतरण का फैसला लिया जाएगा। वन भूमि हस्तांतरण में लागत लाभ विश्लेषण की भी वैज्ञानिक ढंग से गणना की जाएगी। इस गणना में वन भूमि हस्तांतरण से पर्यावरण, पारिस्थितिकी, वन्य जीव, मानव पर होने वाले प्रभावों की आर्थिक समीक्षा कर विवरण दिया जाएगा। क्षतिपूर्ति के लिए वन भूमि की एनपीवी (नेट प्रेजेंट वैल्यू) का आकलन अगले 50 साल में मिलने वाले लाभ के आधार पर किया जाएगा।
वन अधिकारी दोनों घटकों की रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपेंगे। दोनों आंकड़ों के तुलनात्मक अध्ययन के बाद ही जमीन का हस्तांतरण संभव हो सकेगा। सेना से जुड़ी सभी योजनाओं को पूरी तरह छूट दी गई है। वहीं नए संशोधन में होटल, लॉज, इमारत निर्माण जैसे गैर जनहित की योजनाओं को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई है। आमतौर पर प्रदेश में वन भूमि की एनपीवी (नेट प्रेजेंट वैल्यू ) छह से 10 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर है। नए संशोधन में सिंचाई, हाइड्रो पावर, रेलवे, सड़क, ट्रांसमिशन लाइन (जिसमें भूमि सदैव यूजर एजेंसी पर रहेगी) आदि का शुद्ध वर्तमान मूल्य में 30 फीसदी अतिरिक्त जोड़ कर हस्तांतरित होने वाली जमीन की गणना की जाएगी।
वन मंत्रालय ने लागत लाभ विश्लेषण के लिए जारी किए नए निर्देश
वन भूमि से सटे इलाकों के बाजार मूल्य का तीस प्रतिशत भी देना होगा
पहाड़ में पांच, मैदान में 20 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर लागत लाभ विश्लेषण किया अनिवार्य
होटल, रिजार्ट आदि के लिए वन भूमि लेना होगा अब और भी मुश्किल
राष्ट्रीय पार्क में 10, सेंचुरी में देनी होगी पांच गुनी कीमत
हल्द्वानी। केंद्र के नए निर्देशों के मुताबिक यदि राष्ट्रीय पार्क की भूमि हस्तांतरित होती है तो शुद्ध वर्तमान मूल्य का 10 गुना देना होगा। जबकि सेंचुरी में जमीन की कीमत का पांच गुना अधिक मूल्य चुकाना होगा।
बड़ी योजनाओं को लग सकता है झटका
सूबे के 71 फीसदी भू भाग पर जंगल है। यहां की करीब करीब सभी योजनाएं वन भूमि में ही हैं, जबकि दर्जनों वन भूमि हस्तांतरण की वजह से लटकी हुई हैं। ऐसे में प्रदेश में बड़े बड़े प्रस्तावों को झटका लग सकता है जबकि पांच हेक्टेयर से कम भूमि वाली योजनाओं की गाड़ी दौड़ सकती हैं।
इन नए निर्देशों का सबसे बड़ा फायदा यह है कि वन भूमि हस्तांतरण के मामलों में पारदर्शिता आएगी और अलग-अलग तरह से विश्लेषण नहीं हो पाएगा। अब यह साफ कर दिया गया है कि किस तरह के मामलों में लागत लाभ विश्लेषण किया जाएगा और किसमें नहीं। अभी तक कोई स्पष्ट निर्देश न होने के कारण एक ही परियोजना का अलग-अलग तरीके से विश्लेषण भी कर लिया जाता था। भूमि हस्तांतरण की लागत बढ़ जाएगी। इससे जरूरी परियोजनाओं के लिए ही वन भूमि हस्तांतरण हो पाएगा।
-नीतीश मणि त्रिपाठी, प्रभागीय वन अधिकारी, तराई पूर्वी हल्द्वानी