रामनगर (नैनीताल)। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) से मिलने वाला राजस्व कार्बेट पार्क के आसपास रहने वाले ग्रामीणों के उत्थान पर खर्च होने की बजाय राजकोष में जा रहा है। इससेवन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अनुपालन संबंधी राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के निर्देशों की अनदेखी हो रही है। सीटीआर के निदेशक ने पीसीसीएफ को इस आशय का पत्र भेजा है।
पत्र में सीटीआर के निदेशक संजीव चतुर्वेदी ने बताया है कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 38 (ओ) के तहत वन्यजीव पर्यटन के माध्यम से प्राप्त राजस्व स्थानीय लोगों के विकास, आर्थिक उन्नति के लिए खर्च होना था। टाइगर रिजर्व के आसपास पर्यटन कारोबारियों से संरक्षण शुल्क वसूला जाना था। एनटीसीए के इस निर्देश के अनुपालन में वर्ष 2010 में सीटीआर फाउंडेशन बना। तब पर्यटन से प्राप्त 20 प्रतिशत राजस्व इस फाउंडेशन में गया लेकिन 15 मार्च 2019 को जारी शासनादेश के अनुपालन में पूरा राजस्व राजकोष में जा रही है, जहां से राज्य सरकार फाउंडेशन को अनुदान देती है।
ग्रामीणों के उत्थान पर खर्च नहीं हो रही कार्बेट पार्क से हो रही आय
सीटीआर निदेशक संजीव चतुर्वेदी ने पीसीसीएफ को लिखा पत्र
राजकोष में जा रही कमाई, एनटीसीए के निर्देशों की हो रही अनदेखी
पर्यटन से औसतन नौ करोड़ रुपये होती है सीटीआर की आय
रामनगर (नैनीताल)। वर्ष 2015-16 में सीटीआर को 9.10 करोड़ रुपये, 2016-17 में 9.60 करोड़, 2017-18 में 8.70 करोड़, 2018-19 में 8.50 करोड़ रुपये ही राजस्व मिला। यहां पर्यटन गतिविधियों का कुछ लाभ चंद लोगों को अवश्य मिला लेकिन पर्यटन, वन्यजीव संरक्षण के कारण मूलभूत सुविधाओं की कमी, ट्रैफिक जाम, सड़क दुर्घटना, वन्यजीवों के व्यवहार में बदलाव, वन्यजीवों से होने वाले जान-माल के नुकसान जैसी चुनौतियों से बहुत अधिक लोगों को जूझना पड़ रहा है। इसी कारण इको सेंसिटिव जोन का विरोध कर रहे ग्रामीणों समेत कुछ वनाधिकारियों ने भी स्वीकार किया कि प्रकृति संरक्षण के लिए स्थानीय लोगों के अधिकार तो सीमित हुए लेकिन उनके उत्थान के लिए कोई कार्य न होना चिंताजनक है।