नैनीताल। बच्चों में साहित्यिक रुचि के सृजन के उद्देश्य से त्रैमासिक पत्रिका बाल प्रहरी, बालसाहित्य संस्थान की ओर से तीन दिनी राष्ट्रीय बालसाहित्य संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह का शनिवार को शुभारंभ हुआ। नगर के अरविंदो आश्रम में आयोजित कार्यक्रम में देश भर के बाल साहित्यकारों ने हिस्सा लिया।
पहले दिन बच्चे और बाल पत्रिकाएं विषय पर आधारित संगोष्ठी में सत्र के अध्यक्ष डॉ.राकेश चक्र ने कहा कि होमवर्क एवं ट्यूशन के दौर में आज बच्चों के पास खेलने और पत्रिकाएं पढ़ने का समय नहीं है, इससे बच्चों का वास्तविक विकास थम गया है। भलवाड़ा से आए डॉ. भैरूल गर्ग ने कहा कि आधुनिकीकरण एवं स्मार्टफोन के दौर में पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति खत्म हो रही है। कार्यक्रम संयोजक उदय किरौला ने बालसाहित्य और बाल पत्रिकाओं के इतिहास को सबके सामने रखा। इस दौरान शशि ओझा, कमलेश चौधरी, मेजर शक्तिराज, नरेंद्र परिहार, घमंडीलाल अग्रवाल, डॉ. सरोज गुप्ता, हीरालाल सहनी, शमशेर, कौशल्या आदि थे।
स्मार्टफोन के दौर में खत्म हो रही है पढ़ने-पढ़ाने की संस्कृति
साहित्य संगोष्ठी में जुटे देश भर के बाल साहित्यकार
समाजहित है बालसाहित्य का उद्देश्य
100 से अधिक साहित्यिक एवं बालसाहित्य में रचनाएं कर चुके और भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय के बालसाहित्य के श्रीसम्मान सहित साहित्य में कई सम्मान प्राप्त कर चुके मुरादाबाद से आए डॉ. राकेश ‘चक्र’ बताते हैं कि बाल साहित्य ऐसा होना चाहिए, जिससे बच्चों में नई ऊर्जा, आयाम और ज्ञान विज्ञान का संचार हो। बाल साहित्य का मुख्य उद्देश्य समाजहित है, इसलिए ऐसा साहित्य लिखा जाए, जिससे बच्चों को सकारात्मक दिशा मिले।
बच्चों से पहले अभिभावक पढ़ें बालसाहित्य
हरियाणा साहित्य अकादमी सम्मान पुरस्कार समेत 30 से अधिक अखिल भारतीय और अंतरराज्यीय पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार डॉ.शील कौशिक ने कहा कि एक समय था जब बालसाहित्य परिवार के बुजुर्गों द्वारा कहानियों के रूप में बच्चों को सुनाया जाता था, लेकिन आज माता-पिता के पास अपने बच्चों के लिए ही समय नहीं है। उनका कहना है कि बालसाहित्य बच्चों को भविष्य निर्माण के लिए सशक्त ही नहीं बनाता, बल्कि भविष्य में सकारात्मकता के रास्ते पर चलने की सोच भी पैदा करता है। लिहाजा बाल साहित्य को बच्चों से पहले अभिभावक जरूर पढ़ें।
बच्चों के मनोविज्ञान को ध्यान रखकर करें रचनाओं का निर्माण
मूल रूप से अल्मोड़ा और वर्तमान में लखनऊ में रह रही रचनाकार डॉ. करुणा पांडे बताती हैं कि वर्तमान बालसाहित्य बच्चों के मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर लिखा जाना चाहिए, जबकि रचनाकार बच्चों की मनोदशा को समझे बगैर बस नाम कमाने को रचनाओं का निर्माण कर रहे हैं, जो कि बच्चों के विकास में बाधक है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग से साहित्य पतन की ओर जा रहा है। दुनिया के बड़े-बड़े पुस्तकालय आज खाली पड़े हैं, बच्चों की पढ़ने से रुचि खत्म हो रही है, जो बच्चे ई-बुक्स के माध्यम से पढ़ाई कर रहे हैं, उनके भी दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।