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शासन ने हटाया, उच्चशिक्षा निदेशालय ने गुपचुप ढंग से बुलाया

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हल्द्वानी। उच्चशिक्षा निदेशालय के लिए शासन के आदेश भी कोई मायने नहीं रखते। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्रशासनिक आधार पर यहां से हटाए दो वरिष्ठ कर्मचारियों को मौखिक आदेश पर निदेशालय बुलाकर वार्षिक स्थानांतरण प्रक्रिया का काम कराया जा रहा है। इन कर्मचारियों की तैनाती पहाड़ के कॉलेजों में है। पिछले कई माह से हल्द्वानी में बने हैं। उच्चशिक्षा मंत्री की सख्ती पर जिन प्राध्यापकों, कर्मचारियों की संबद्धता समाप्ति की गई थी, उनमें शामिल कुछ प्राध्यापकों, कर्मचारियों को दुर्गम की सेवा का लाभ दे दिया गया है।
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उच्चशिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने पिछले माह ही उच्चशिक्षा निदेशालय द्वारा बडे़ पैमाने पर प्राध्यापकों एवं शिक्षणेतर कर्मचारियों के अवैध रूप से किए गए दुर्गम से सुगम में संबद्धता के मामले की हेराफेरी पकड़ी थी, तब पता चला था कि खेल को अंजाम देने के लिए उनके नाम का इस्तेमाल भी किया गया था। मंत्री के कड़े रुख पर शासन ने एक सिरे से 150 से अधिक की संबद्धता समाप्त करने के आदेश जारी कर दिए थे। इस मामले में भूमिका निभाने वालों पर कार्रवाई की बात भी कही गई लेकिन उच्चशिक्षा निदेशालय पर इसका कोई असर दिखाई नहीं दिया। निदेशालय द्वारा इससे आंखें फेरते हुए 150 से अधिक सुगम में रहे इन प्राध्यापकों एवं कर्मचारियों को दुर्गम की सेवा का लाभ दिया जा रहा है। अपलोड किए गए सेवा इतिहास की जांच से इसके स्पष्ट प्रमाण हैं। मात्र एक माह पूर्व संबद्धता का सारा रिकॉर्ड निदेशालय में उपलब्ध होते हुए भी इसको छिपाने की चर्चा विभाग में है। इस संबंध में प्रभारी निदेशक डॉ. एससी पंत से बात करने की कोशिश की लेकिन उनका मोबाइल फोन रिसीव नहीं हुआ।


शासन ने हटाया, उच्चशिक्षा निदेशालय ने बुलाया
प्रशासनिक आधार पर हटाए गए कर्मियों को मौखिक आदेश कर रखा तैनात, स्थानांतरण प्रक्रिया से जोड़ा
मंत्री की सख्ती भी बेकार, संबद्धता समाप्ति वाले कई प्राध्यापकों को दुर्गम सेवा का लाभ


कई प्राध्यापकों का सर्विस रिकॉर्ड नहीं मिल रहा
हल्द्वानी। उच्चशिक्षा निदेशालय के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि समाजशास्त्र, इतिहास, राजनीतिशास्त्र आदि कई विषयों में कई प्राध्यापकों का समूचा सर्विस रिकॉर्ड ही नहीं मिल रहा है। इस कारण इसे अपलोड ही नहीं किया जा सका है। पिछले वर्ष भी इन्हें वीआईपी दर्जा दिया गया था जबकि ये कभी दुर्गम गए ही नहीं।
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