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अपने जंगल का शोध उतराखंड के लिए पराया

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croocked forest
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हल्द्वानी। उत्तराखंड के वनों में होने वाला शोध प्रदेश के किसी काम का नहीं है। यहां के जंगलों में शोध करने वाले संस्थान और शोधार्थी प्रदेश के वन विभाग को इसकी जानकारी साझा नहीं करते। इसको देखते हुए वन संरक्षक अनुसंधान वृत्त ने इसका प्रस्ताव राज्य के प्रमुख वन संरक्षक को भेजा है। प्रस्ताव के अनुसार अब प्रदेश के जंगलों में होने वाले शोध को वन विभाग से तीन स्तर पर साझा करना होगा।
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उत्तराखंड के वन जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध हैं। इसी कारण शोध करने वालों के लिए यहां के जंगल शोध करने वालों को आकर्षित करते हैं। राज्य गठन के बाद शोध करने वाले संस्थानों और शोधार्थियों को जंगलों में शोध करने वालों को वन विभाग से अनुमति लेनी पड़ती है। इसके बाद शोध कार्य किया जाता है। वनों में वनस्पतियों, वन्यजीवों और जंतुओं पर शोध करने के बाद शोध करने वाले राज्य सरकार को शोध के बारे में बिना कोई जानकारी दिए चले जाते हैं। इसके बाद शोध को पेटेंट करा लेते हैं। अपने ही घर का शोध वन विभाग के किसी काम नहीं आता है। हर साल उत्तराखंड के करीब एक दर्जन शोध पत्र विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। प्रस्ताव के अनुसार शोध करने वालों को संबंधित वन प्रभाग, वन अनुसंधान वृत्त और वन विभाग को देनी होगी। प्रदेश के जंगलों में कई शोध कार्य निजी संस्थानों ने किए। बताया जा रहा है कि कुछ शोध संस्थानों से लुप्त प्राय प्रजातियों के शोध की जानकारी वन विभाग ने इनसे मांगी लेकिन शोध संस्थानों ने विभाग को यह जानकारी देने से इंकार कर दिया।


अपने जंगल का शोध उत्तराखंड के लिए पराया
शोध करने वाले नहीं देते प्रदेश के वन विभाग को जानकारी, अब करना होगा साझा


अपने जंगल की कमियां और अच्छाई दूसरों से पता चलती है
जंगलों में होने वाले शोध से कई वन्यजीवों, वनस्पतियों, पेड़ और पौधों की खूबियां और कमियां सामने आती हैं। शोध से पता चलता है कि कौन सी प्रजाति जंगल में बढ़ रही है और कौन सी घट रही है। बाहर के शोध करने वाले विभाग को कोई सूचना नहीं देते इसलिए यह पता नहीं चलता कि वनों में कौन सी प्रजाति संकटग्रस्त है और कौन सी बढ़ रही है।
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कई संस्थान करते हैं सर्वे कार्य
प्रदेश में कई संस्थान संस्थान शोध करते हैं। इनमें से फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट, जीबी पंत हिमालयन शोध संस्थान, वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया जैसे सरकारी संस्थान शोध करते हैं। इसके अलावा कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी वनों और वन्यजीवों पर रिसर्च करते हैं।


वन विभाग के जंगलों में शोध करने करने वाले शोधपत्र वन विभाग से साझा नहीं करते। इसी कारण अपने ही जंगल का शोध विभाग के काम नहीं आता है। इसी कारण शोधपत्र विभाग को भी उपलब्ध कराने के लिए मुख्यालय को प्रस्ताव भेजा गया है।
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-संजीव चतुर्वेदी, वन संरक्षक अनुसंधान, उत्तराखंड
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