नैनीताल। हाइकोर्ट के फैसले ने राज्य आंदोलनकारियों के जख्मों को एक बार फिर हरा कर दिया है। अलग राज्य की मांग करने वाले आंदोलनकारियों को एक बार फिर मुजफ्फरनगर कांड याद आ गया है। आंदोलनकारियों का कहना है जब समाज में पहले से कई आरक्षण मौजूद हैं तो आंदोलनकारियों से परहेज नहीं किया जाना चाहिए। आंदोलनकारी लड़ाई आगे भी जारी रखने की बात कह रहे हैं।
उत्तराखंड अलग राज्य बने 17 साल से ज्यादा समय बीत गया है, लेकिन आंदोलनकारियों को आज भी 1994 को मुजफ्फरनगर कांड याद है। मुख्यमंत्री के पूर्व विधि सलाहकार व सुप्रीम कोर्ट के पूर्व अपर महाधिवक्ता अवतार सिंह रावत बताते हैं कि उनके पिता शिव सिंह रावत आजाद हिंद फौज में थे। 1994 में पूरे उत्तराखंड में अलग राज्य बनने चाह थी। इसी दौरान उन्हें उत्तरांचल जनता संघर्ष मोर्चा का अध्यक्ष बना दिया गया। उनका तर्क है कि समाज में आज तमाम आरक्षण मौजूद हैं। एक राज्य में 70 प्रतिशत आरक्षण है। राज्य आंदोलनकारियों ने दिन रात एक कर कार्य किया। परिवार छोड़ा, पुलिस की लाठियां खाईं, कई बहन बेटियों को बेइज्जत होना पड़ा, हजारों लोगों को कई बार जेल में डाल दिया गया। आंदोलनकारियों के बच्चे कब बड़े हो गए, उन्हें पता ही नहीं चला। दो अक्तूबर 1994 का दिन आज भी रूह कंपा देता है। बुधवार को हाइकोर्ट का फैसला आया तो आंदोलनकारियों के जख्म एक बार फिर हरे हो गए। अगर कोई व्यक्ति सभी सुविधाओं को त्याग कर आंदोलन करता है और उसका आंदोलन सफल रहता है तो यह मानव चाह है कि उसे उपहार स्वरूप कुछ मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि हाइकोर्ट के फैसले का वह स्वागत करते हैं, लेकिन इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के वह पक्षधर हैं। राज्य आंदोलन में प्रतिभाग करने वाले उत्तराखंड देवभूमि के केएल आर्या का कहना है कि वह हाइकोर्ट के फैसले का स्वागत करते हैं। राज्य आंदोलनकारियों ने कभी आरक्षण नहीं मांगा था। सरकार ने खुद ही आरक्षण दिया था, लेकिन जब आंदोलनकारी चिंहित हुए तो उसमें गड़बड़ी हो गई। महिला, पुरुष, बूढ़े और बच्चे सभी ने अलग राज्य बनाने के लिए संघर्ष किया था, लेकिन अब उन्हें निराशा होती है।