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जंगल के राजा का आबादी तक आतंक

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सितारगंज। सितारगंज क्षेत्र में पिछले चार माह से जंगल के राजा की दहशत है। बाघ अब तक एक मजदूर को अपना शिकार भी बना चुका है। वन विभाग की कांबिंग सिर्फ पद चिन्हों को तलाशने तक सिमटी है। विभाग चार माह से 24 किमी के दायरे में बाघ की तलाश कर तो रहा है लेकिन उसे अब तक नहीं पकड़ा गया है। आबादी में बाघ की आवाजाही कभी भी बड़ी घटना का सबब बन सकता है।
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सितारगंज के पूर्व में नानकसागर जलाशय व कैलाश नदी है। पश्चिम में बैगुल जलाशय और बैगुल नदी बहती है। इन जलाशयों और नदियों से तराई पूर्वी वन प्रभाग के बाराकोली, रंसाली और किशनुपर रेंज जुड़े हैं। 11 नवंबर को नगर से करीब चार किमी दूरी पर स्थित कैलाश नदी के तट पर बसे तुर्कातिसौर गांव में 48 वर्षीय शकूर अहमद को घास काटने के दौरान गन्ने में छिपे बाघ ने अपना शिकार बनाया। जबकि साथी मजदूर मो. रफीक ने भागकर जान बचाई थी।

करीब एक माह तक तराई पूर्वी वन प्रभाग की विभिन्न रेंजों की टीमों ने यहां अधिकारियों के साथ डेरा जमाया और आदमखोर बाघ की तलाश में कांबिंग की। ट्रैप कैमरे लगाए, लेकिन अब तक बाघ हाथ नहीं आया। उस दिन के बाद से क्षेत्र के लोग दहशत में रात गुजार रहे हैं।
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घटना के एक माह बाद तुर्कातिसौर गांव से करीब पांच किमी. दूर बघौरी में बाघ के पंजे देखे गए। जनवरी में बाघ ने फिर दस्तक दी। सबसे पहले चीकाघाट गांव में कैलाश नदी के तट पर उसके पंजों के निशान मिले। दो दिन तक यहां बाघ के विचरण से दहशत रही। इसके बाद तुर्कातिसौर गांव से करीब तीन किमी. दूरी पर कैलाशपुरी गांव में नाले के किनारे बाघ दिखाई दिया।

सप्ताह भर भी नहीं हुआ कि फिर यहां से दो किमी. दूरी पर स्थित चौमेला गांव में बाघ के पंजे मिले। इसके बाद यहां से करीब 16 किमी. दूर शक्तिफार्म के जगतारपुर गांव में बाघ ने युवक पर हमला किया और फिर जगतारपुर से आठ किमी. दूर बाराकोली जंगल के बैगुलडाम में स्कूल के आसपास बाघ की दस्तक हुई। चार फरवरी को चीकाघाट हाइवे किनारे बाघ की गतिविधि दर्ज की गई। इसके बाद बुधवार को झाड़ी गांव में पदचिन्ह मिले हैं। शहर के वार्ड संख्या छह नहरपार में भी बाघ की सूचना से खलबली मच गई है।

वन विभाग इन सभी गांवों व नदी नालों के किनारे कांबिंग के साथ सावधानी के लिए मुनादी तो कर रहा है, लेकिन बाघ के ठिकाने तक अभी भी नहीं पहुंचा। वन अधिकारी पदचिन्हों के आधार पर बाघ की बात स्वीकार तो रहे हैं लेकिन ट्रैप कैमरे और पिंजरे आज तक काम नहीं आए। जिससे लोगों में वन विभाग की कार्यप्रणाली के खिलाफ रोष है।

तेंदुए और बाघ के पदचिन्ह एक समान होते हैं। तुर्कातिसौर की घटना के बाद बाघ न तो कैमरों में ही कैद हुआ है और न किसी को दिखा। तुर्कातिसौर से पदचिन्ह और मल के नमूने भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून को जांच के लिए भेजे हैं। वहीं से तेंदुए अथवा बाघ की पुष्टि होगी। उसके बाद ही सही ठिकाने तक पहुंचा जा सकेगा।
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-प्रदीप कुमार धौलाखंडी, रेंजर, बाराकोली वन क्षेत्र, सितारगंज।
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