रामनगर (नैनीताल)। विलुप्त हो रहे गिद्धों की संख्या बढ़ाने के लिए भारत और नेपाल ने संयुक्त पहल की है। संरक्षित प्रजनन कार्यक्रम के तहत जगह-जगह कई केंद्र खोले गए हैं। कोशिश यह की जा रही है कि जैसे-तैसे गिद्धों की संख्या में बढ़ सके। नेपाल में गिद्धों को रेडियो कॉलर लगाए जा रहे हैं। इन दिनों एक गिद्ध कॉर्बेट नेशनल पार्क पहुंचा है। इसकी पीठ पर ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) युक्त रेडियो कॉलर लगा हुआ है। इसे नेपाल से चार नवंबर को छोड़ा गया था। 550 किमी की यात्रा कर यह 24 नवंबर को उत्तराखंड पहुंचा है।
दून विश्वविद्यालय के शोधार्थी और गिद्ध विशेषज्ञ खीमानंद बलोदी ने बताया कि 1990 के दशक में गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट आ गई थी। वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि इसका मुख्य कारण ऑक्सीटोसिन और डाइक्लोफेनेक नाम का इंजेक्शन है जो मवेशियों को लगाया जाता था। मवेशी जब मरता तो उसका मांस खाने से गिद्ध बीमार हो जाते थे। गिद्धों के लीवर, गुर्दे खराब हो जाते थे। इसे रोकने के लिए भारत, नेपाल की सरकारों ने 2006 में संरक्षित प्रजनन कार्यक्रम शुरू किया। इससे सफेद पीठ वाले गिद्धों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। इसकी निगरानी के लिए नेपाल के कावासोती जिला नवलपरासी में इन गिद्धों पर रेडियो कॉलर लगाए गए हैं। इसके माध्यम से इन गिद्धों की जीवन शैली पर नजर रखी जा रही है। कार्बेट टाइगर रिजर्व के उपनिदेशक अमित वर्मा ने बताया कि नेपाल से आए गिद्ध की लोकेशन ढेला रेंज के जंगल में मिली है। उसने एक सांभर को भी खाया है। उसकी निगरानी की जा रही है। इस गिद्ध के कॉर्बेट पार्क में दिखाई देने से वन्यजीव प्रेमी खुश हैं।
बाघों में अब तक नहीं लग पाए रेडियो कॉलर
कार्बेट टाइगर रिजर्व (सीटीआर) में रहने वाले बाघों पर रेडियो कॉलर लगाने का काम शुरू तक नहीं हो सका है। इसके लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) करीब पांच साल पहले से प्रयासरत है। ऐसे में संकटापन्न राष्ट्रीय पशु बाघ पर प्रकृति का स्वच्छक गिद्ध भारी पड़ता नजर आ रहा है जबकि रेडियो कॉलर लगने से अमानगढ़ यूपी और दूसरे वन प्रभागों की सीमा पर मिलने वाले बाघों के शव की पहचान समेत शिकारियों पर भी अंकुश लग सकता था।