हल्द्वानी। जंगली जानवरों के आतंक से परेशान काश्तकारों के लिए अच्छी खबर है। यदि वह चाहें तो परंपरागत खेती की जगह हर्बल खेती भी कर सकते हैं। हर्बल खेती न केवल जंगली जानवरों से सुरक्षित है बल्कि इसमें पारंपरिक खेती की तुलना में कहीं अधिक मुनाफा भी है। रामगढ़ ब्लॉक में कई काश्तकार ऐसे हैं, जो हर्बल खेती कर रहे हैं। इन्हीं में से एक सूपी गांव निवासी सुरेंद्र सिंह बिष्ट हैं, जो हर्बल खेती में अपनी पहचान बना चुके हैं।
सूपी गांव निवासी बिष्ट सालों से सेब, खुमानी, पूलम, अखरोट और नाशपाती की बागवानी से जुड़े हैं। उन्होंने वर्ष 2008 में जैविक उत्पाद परिषद के सहयोग से हर्बल खेती की शुरूआत की। ब्लॉक स्तर पर तैनात मास्टर ट्रेनर से जानकारियां लेने के बाद गुलमेहंदी, अजवाइन, पीपरमेंट, थाइम, लेमनग्रास की खेती शुरू की। वह अब तेजपत्ता भी लगा रहे हैं। उन्होंने बताया कि हर्बल खेती की खास बात यह है कि इसे जंगली जानवर नुकसान नहीं पहुंचाते और बाजार में भी इसकी अच्छी कीमत मिलती है। हर्बल की फसलों का उपयोग मुख्य रूप से चाय और मसालों के रूप में होता है, इनके औषधीय गुण भी हैं।
बिष्ट अब तक अपने हर्र्बल उत्पादों की एनसीआर, दिल्ली, लखनऊ, देहरादून, हल्द्वानी, नैनीताल व भवाली समेत कई जगह प्रदर्शनी भी लगा चुके हैं। दिल्ली और गुड़गांव समेत अन्य बड़े शहरों में हर्बल उत्पाद की कीमत औसतन 1000 से लेकर 1500 रुपये किलो तक मिल जाती है।