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सिर्फ 5290 घन मीटर रेता, बजरी की ही होगी निकासी

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सिर्फ 5290 घन मीटर रेता, बजरी की ही होगी निकासी
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हल्द्वानी।

गौलापार अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के पास आरक्षित वन क्षेत्र में हुए अवैध खनन के मामले में यह तय कर लिया गया है कि इस जगह से सिर्फ 5,290 घन मीटर खनन सामग्री की ही निकासी दी जाएगी। यह निकासी भी वन विभाग की देख रेख में होगी और वन विभाग इसका रवन्ना काटेगा। शुक्रवार को डीएम नैनीताल के निर्देश पर बनी कमेटी ने निरीक्षण किया और अपनी रिपोर्ट प्रशासन को सौंपी।
रिपोर्ट में अब यह साफ संस्तुति कर दी गई है कि यहां पर पहले से डंप खनन सामग्री में से 5,290 घन मीटर रेता, बजरी उठाने की अनुमति दी जाएगी। यह मामला उस समय विवाद में आया था जब 5,290 घन मीटर खनन सामग्री की अनुमति की आड़ में खनन माफिया ने आरक्षित वन क्षेत्र से रात में खनन करना शुरू कर दिया था। मामला सुर्खियों में आया तो वन विभाग ने यह खनन रुकवाया था और संबंधित लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। इसके बाद एक कमेटी ने इस क्षेत्र का निरीक्षण भी किया था, लेकिन वन विभाग इस कमेटी की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं था। कहा गया था कि कमेटी में वन विभाग का प्रतिनिधि शामिल नहीं किया गया। इसके बाद जिलाधिकारी के निर्देश पर बनी कमेटी में वन विभाग का प्रतिनिधि भी शामिल किया गया।
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शुक्रवार को नई बनी कमेटी ने मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया। कमेटी ने माना कि यहां से अवैध खनन किया गया है। निरीक्षण के बाद कमेटी ने अपनी रिपोर्ट भी तैयार कर ली है। सूत्रों केमुताबिक रिपोर्ट में यह भी संस्तुति कर दी गई है कि खनन सामग्री ले जाने के लिए वन विभाग की सड़क का इस्तेमाल होने पर वन विभाग को रोड टैक्स भी दिया जाएगा।

कई गुना अधिक खनन सामग्री मौजूद है यहां

बात सिर्फ 5,290 घन मीटर खनन सामग्री की हो रही है। सूत्रों का कहना है कि यहां पर इस समय खनन सामग्री कई गुना अधिक है। इस वजह से ही इस खनन सामग्री को उठाने की अनुमति के लिए जमीन आसमान एक किया जा रहा था। अब मात्र 5,290 घन मीटर माल ही यहां से उठ पाएगा। जिला प्रशासन 5,290 घन मीटर सामग्री के हिसाब से पहले ही करीब 51 लाख रुपए जमा करवा चुका है।
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करीब 15 गाड़ियों को ट्रेस करने की कोशिश

स्टेडियम के नजदीक की आरक्षित भूमि से रात में खनन करने वाली करीब 15 गाड़ियों को ट्रेस करना मुश्किल हो रहा है। वन विभाग के सूत्रों के मुताबिक ये गाड़ियां बरेली की है पर इनका नाम-पता नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में वाहन रजिस्ट्रेशन आदि के आधार पर इन गाड़ियों को ट्रेस करने की कोशिश की जा रही है।
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