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तेल से तौल कांटे में लाखों का खेल

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हल्द्वानी। गौला खनन गेटों के इलेक्ट्रानिक तौल कांटों पर कहने को तो ठेका लेने वाले को एक वाहन से सिर्फ 15 रुपये मिलते हैं लेकिन इसके पीछे लाखों का खेल होता है। डंपर से स्टोन क्रशर से कई अधिकारी कर्मचारी तक खेल के हिस्सेदार होते हैं।
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गौला नदी में 11 गेटों से 7500 वाहनों से उप खनिज की निकासी की जाती है। इसमें वाहन ट्रैक्टर ट्राली, डंपर, टिपर की क्षमता के अनुसार लदान किया जाता है। लदान क्षमता से अधिक यानी ओवरलोडिंग न हो इसलिए गेट पर सीसीटीवी भी लगाया गया है जिसकी रिकार्डिंग वन, वन निगम के अधिकारी भी देख सकते हैं। सीसीटीवी के शीशे पर सरसों के तेल या ग्रीस की बूंद लगा दी जाती है इससे तस्वीरें तो आती है लेकिन हल्की धुंधली होती है। अब वाहनों की तुलाई में गड़बड़ी की जाती है। अगर ट्रैक्टर ट्राली तुलाई के लिए आई तो कांटे पर इस तरह खड़ी की जाती है कि आगे के दोनों पहिये बाहर हो जाते हैं। जानकारों की मानें तो ऐसा करने से 25 से 80 क्विंटल तक का वजन बचता है जो ओवरलोडिंग में काम आता है। इसी तरह डंपर को भी कांटे और जमीन के बीच गैप में खड़ा किया जाता है ताकि वजन हल्का हो जाए और अंतर को उप खनिज से पूरा किया जाए। इस तरह हर चक्कर पर न्यूनतम 25 अधिकतम 100 क्विंटल की ओवरलोडिंग होती है।

ये होता है फायदा
खनन गेटों पर तोले गए वाहनों की स्टोन क्रशर पर अलग से तुलाई अलग होती है फिर बिना रायल्टी लाए गए उप खनिज का वाहन स्वामी को 15 से 20 रुपये प्रति क्विंटल अधिक मिलता है। यानी गाड़ी का खर्च ओवरलोड से निकलता है बाकी आय अपनी जेब में जाती है।
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बिना रायल्टी का उप खनिज आने पर स्टोन क्रशर को भी रायल्टी शुल्क आदि नहीं चुकाना पड़ता है इससे काफी कम दाम में माल मिलता है जो मोटे दामों पर उपभोक्ता को बेच दिया जाता है।
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तौल कांटों पर जो निजी आपरेटर होते हैं उनका वेतन काफी कम होता है तो अतिरिक्त आय के लिए वे ओवरलोडिंग कराते हैं।
ओवर लोडिंग के माल में वन, वन निगम के कर्मी की हिस्सेदारी होती है तो वे भी चुप्पी साधे रहते हैं।
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