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अब कुछ प्राध्यापकों को प्रोफेसर पद की रेबड़ी बांटने की तैयारी

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हल्द्वानी। प्राध्यापकों को प्रोफेसर पद नाम देने के नाम पर उच्च शिक्षा निदेशालय ने प्राध्यापकों को ही कई धड़ों में बांट दिया है। कुछ का वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन (एपीआई) चार पन्नों का है तो कुछ का 27 पन्नों का। हद तो यह है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियम लागू होने के बाद भी 2001 के नियम कुछ मामलों में लागू कर दिए गए। साफ है कि रेवड़ी बंट रही है और अपनों-अपनों को देने की कोशिश है।
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उच्च शिक्षा विभाग अभी प्राचार्यों को प्रोफेसर पद नाम देने के विवाद से उबर नहीं पाया है। अब प्राध्यापकों के साथ भी यही किया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो कुछ प्राध्यापकों को 2001 के यूजीसी के नियमों का हवाला देते हुए चार पन्नों का आवेदन भरवाया गया है। कुछ प्राध्यापकों से 27 पन्नों की एपीआई भरवाया गया। जिन प्राध्यापकों से 2001 के यूजीसी नियम के तहत प्रोफेसर के आवेदन भरवाये गए हैं, उनको सेवानिवृत्ति यूजीसी के 2010 के अधिनियम के अनुसार 60 से 65 वर्ष की गई है। 2010 के यूजीसी अधिनियम के बाद 2001 का अधिनियम समाप्त हो गया।
यूजीसी के 2010 के अधिनियम के अनुसार कुल पदों के सापेक्ष मात्र 10 प्रतिशत ही प्रोफेसर बन सकते हैं। स्पष्ट है कि मेरिट बनेगी। परंतु चार प्रकार के लोगों की मेरिट कैसे बनेगी? प्राध्यापकों का कहना है कि प्राचार्य भी शिक्षक संवर्ग का ही हिस्सा हैं। अब 1360 कुल प्राध्यापकों में से 136 ही प्रोफेसर बन सकते हैं। यदि 100 प्राचार्य प्रोफेसर बन गए और साथ ही निदेशालय में कार्यरत प्राध्यापक भी बिना एपीआई के प्रोफेसर गए तो बाकी प्राध्यापकों पर यूजीसी के नियम क्यों थोपे जा रहे हैं।
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प्राध्यापकों को ‘प्रोफेसर’ पद देने के लिए आवेदन पत्रों की स्क्रीनिंग की जा रही है। इसके बाद एपीआई के आधार पर चयन होगा। आवेदकों के इंटरव्यू की प्रक्रिया 11 मई से हर हाल में शुरू होगी।
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-डॉ. सविता मोहन, प्रभारी निदेशक उच्चशिक्षा
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