फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इनकी दीवाली रही अधूरी

Thu, 19 Oct 2017 12:03 AM IST
दीपिका नेगी
विज्ञापन
deepawali - फोटो : demo
विज्ञापन
हल्द्वानी। दीपावली जैसे उमंग भरे त्योहार में सब अपनों का साथ ही चाहते हैं। यह मौका होता है अपनों के साथ खुशी बांटने का। लेकिन वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनके लिए यह चाहत अधूरी रह जाती है। ऐसे ही लोगों में हल्द्वानी के जिला शरणालय एवं प्रवेशालय (नारी निकेतन) में रह रही कुछ संवासिनियां भी शामिल हैं। ये जाने अनजाने अपने परिवार से बिछड़ गई हैं। नारी निकेतन की अधीक्षक ज्योति पटवाल ने बताया कि यहां रह रहीं संवासिनियों में कुछ मूक बधिर और मंद बुद्धि हैं, इसलिए इनके परिवार को ढूंढना मुश्किल है। मगर एक उम्मीद की रौशनी है कि उन्हें अपना परिवार मिल जाएगा।
विज्ञापन


हर कोई जाना चाहता है घर
सोनू- संस्था में रह रही सोनू अस्पष्ट बोलती है। रहन सहन और बातचीत से सोनू मुस्लिम धर्म की लगती है। घर जाने की बात पर नम और उम्मीद भरी निगाहों से उसके मुंह से अब्बा और अम्मी निकला। उसने बताया कि वह लालकुआं की रहने वाली है, मां का नाम भिन्नो है। दो भाई और एक बच्चा है। मंद बुद्धि सोनू रुद्रपुर इंद्राचौक पर भटकते हुए मिली थी। 15 अक्तूबर 2017 को संस्था में आई।
चंदा- घर वापस लौटने की कसक और उम्मीद से भरी चंदा किसी भी जतन से अपने नेपाल जाना चाहती है, लेकिन अभी तक आस की कोई खिड़की खुली नहीं है। अपनी नेपली मिश्रित टूटी फूटी हिंदी में वह कहती है कि उसके पिता मुरादाबाद में चौकीदारी का काम करते थे। वह भटक कर यहां पहुंच गई है। एक सितंबर 2017 को संस्था में आई थी।
विज्ञापन

आयशा- उत्साह से दमकती आयशा ने अमर उजाला के संवाददाता को देखते ही कहा कि दीदी मेरी भी फोटो खींचो न। उसने गाना गाकर भी सुनाया और कहा कि उसे फिल्में देखना पसंद है। आमिर और सलमान खान उसके पसंदीदा अभिनेता हैं। पति रहिमुद्दीन दिल्ली में रहता है। कहती उसका मायके का पता मोतीमहल, झांसी की रानी, शिवजी का मंदिर मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश बताती है। जहां मां खतीजा रहती हैं।
शोभा और अफसानी- दोनों रुद्रपुर स्वाधार केंद्र से यहां स्थानांतरित की गईं थीं। दोनों ही मूक बधिर हैं। वह चार अगस्त 2017 को संस्था में आईं थीं। जब घर जाने के लिए पूछा गया तो अपने उनकी आंखों में एक खुशी की चमक आ गई। कपड़े ठीक करते हुए इशारों में फोटो खींचने को कहा। शायद उन्हें उम्मीद है कि घर वाले अखबार में उन्हें देख लेंगे और वापस साथ ले जाएंगे।

रुखसाना- जब रुखसाना से घर जाने की बात पूछी गई तो वह फफक कर रो पड़ी। घर से दूर रहने का गम उसकी आंखों में साफ नजर आता है। मासूम चेहरे बस एक ही सवाल कर रहा था कि उसके घर वाले उसे अब तक क्यों नहीं ढूंढ पाए। उसके पिता का नाम रियासत अली और मां का नाम हमीदन है। खुद को मोहल्ला पठानकोट, तहसील बड़ौत जिला बागपत की बताने वाली रुखसाना मंदबुद्धि है। वह यहां 13 अगस्त 2016 से है।

घर के नाम पर हो जाती हैं आंखें नम
यहां रह रहीं कुछ किशोरियों ने अमर उजाला से की गई बातचीत में बताया कि उन्हें परिवार के साथ मनाई गई दीवाली हमेशा याद आती है। भीगी आंखों से उन्होंने जवाब दिया कि घर वालों की याद बहुत आती है, लेकिन अब यही उनका परिवार है। जब दीवाली के त्योहार की तैयारियों को लेकर पूछा तो बताया कि वह ऐंपण तैयार कर रहीं हैं। वह खासी उत्साहित हैं। विशेष पकवान बनाए जाएंगे। दीये, मोमबत्तियों और अन्य सजावट से संस्था की रौनक बढ़ाएंगीं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें