अभी तक बाघ, तेंदुआ और हाथी के कारण इंसानी और वन्यजीव के बीच ज्यादा टकराव होता है। पर आने वाले समय में मगरमच्छ (जल) से इंसानों के लिए चुनौती बढ़ सकती है। कोसी और शारदा लैंड स्केप में सौ मगरमच्छ हैं, जिनके कारण वन्यजीव-मानव संघर्ष रोकने के लिए कोई ठोस कार्ययोजना नहीं है। यह संकेत और स्थितियां वन विभाग और कुमाऊं विवि के संयुक्त अध्ययन में सामने आई हैं। अब वन विभाग का दावा है कि अध्ययन के बाद इस दिशा में योजनाबद्ध तरीके से कार्य कराया जाएगा।
वन विभाग ने मगरमच्छ और इंसानी टकराव को लेकर 2014 से 2016 तक तराई (कोसी और शारदा के लैंड स्केप एरिया) में अध्ययन कराया था। इस अध्ययन में कुमाऊं विवि के डिपार्टमेंट आफ फॉरेस्ट्री एंड एनवायरमेंट साइंस के शाह बिलाल, जीतराम वन संरक्षक डा. पराग मधुकर धकाते, डीएफओ नितिशमणि त्रिपाठी शामिल थे।
अध्ययन में शामिल शाह बिलाल कहते हैं कि तराई लैंडस्केप के जलाशय में करीब 100 मगरमच्छ रिपोर्ट हुए हैं। वर्तमान में अन्य जगहों की तरह मगरमच्छ के वास स्थलों पर संकट मंडरा रहा है। मगरमच्छ इंसानी आबादी के आसपास की खासकर सिंचाई नहरों आदि के माध्यम से करीब रह रहे हैं। 2014 से 2016 के तीन सालों के अध्ययन में देखा गया है कि 11 बार मगरमच्छों को इंसानी इलाके से रेस्क्यू किया गया है। मगरमच्छों के हमले में दो लोगों की जान गई और आठ लोग घायल हुए हैं।
लोगों को जागरूक किया जाएगा
इस अध्ययन से मगरमच्छों की संख्या, उनके वास स्थल की स्थितियां, संघर्ष आदि के बारे में जानकारी सामने आई है। भविष्य में मानव-मगरमच्छ संघर्ष को कम करने और मगरमच्छों के वास स्थल सुधार समेत कई कार्य करने की योजना बनाई गई है। इसके अलावा तय हुआ है कि मगरमच्छों की लगातार गिनती, उनकी मानीटरिंग आदि कार्य करने से लेकर जलाशयों के आसपास रहने वालों को जागरूक भी किया जाएगा।
डा. पराग मधुकर धकाते, वन संरक्षक पश्चिमी वृत्त।