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विकास की भेंट चढ़ रहा एक और गांव

Mon, 12 Aug 2013 10:55 AM IST
उत्तरकाशी/ब्यूरो
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विकास के चलते टिहरी श्ाहर की तरह अब उत्तराखंड का एक और गांव पानी में समा रहा है। जोशियाड़ा में रहने वाले लोगों के घर और उनकी अनमोल यादें पानी में डूब रही हैं।
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304 मेगावाट की मनेरी भाली स्टेज टू परियोजना के डूब क्षेत्र में आ रही जोशियाड़ा बस्ती के निवासियों को मुआवजा देकर उत्तराखंड जल विद्युत निगम ने आर्थिक क्षतिपूर्ति तो कर दी है। अब उनके पास केवल यादें ही बची हैं।
 
वर्ष 1960 में उत्तरकाशी अलग जिला बनने के बाद जोशियाड़ा बस्ती अस्तित्व में आई थी। इक्का-दुक्का घर और दुकानों से आगे बढ़ते हुए कुछ ही सालों में यह क्षेत्र का बड़ा व्यापारिक केंद्र बन गया। वर्ष 1978 की बाढ़, 1991 के भूकंप, 2003 के वरुणावत भूस्खलन के बाद तो जोशियाड़ा तेजी से आबाद हुआ।
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कुछ सालों से यहां की रौनक देखने लायक थी। 304 मेगावाट की मनेरी भाली स्टेज टू परियोजना बनी तो इस पर संकट छा गया। निगम ने यहां 62 घरों को डूब क्षेत्र में चिह्नित किया। मुआवजा आदि मांगों को लेकर पिछले सात सालों की उठापटक के बाद अब फैसला हो गया है। प्रभावित अपने मकान तोड़ेंगे और निगम उन्हें मुआवजा तथा कुछ को जमीन उपलब्ध कराएगा। इसी के चलते एक हंसती खिलखिलाती बस्ती को आजकल युद्धस्तर पर उजाड़ा जा रहा है।

घर छोड़ना काफी तकलीफदेह
सालों पहले जोशियाड़ा आकर बसे मनोज रांगड़ बताते हैं कि उनके दादा स्व.गोबर सिंह रांगड़ ने वर्ष 1965 में मकान  बनाया था। यहीं उनका जन्म हुआ और यहीं से जिंदगी का ककहरा सीखा। अब अपने आशियाने को स्वयं उजाड़ने में खासी तकलीफ हो रही है।

गाजणा ब्रह्मपुरी से जोशियाड़ा आकर बसे कलीराम भट्ट बताते हैं कि जंगलों से पत्थर ढोकर बड़ी मेहनत से यहां मकान तैयार किया था। यहां से सारी अनमोल यादें जुड़ी हैं। उम्र के इस पड़ाव में घर छोड़ना काफी तकलीफदेह है।

हमारा भी विस्थापन करे सरकार
जोशियाड़ा में एक छोर की बस्ती उजड़ने के साथ ही दूसरे छोर वाली बस्ती के लोगों की चिंताएं बढ़ने लगी हैं। व्यापार लगभग चौपट होने से लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि वे क्या करें और कहां जाएं। जोशियाड़ा व्यापार संघर्ष समति के अध्यक्ष अजीत गुंसाई, अमित नेगी, आरएस.नेगी आदि का कहना है कि बस्ती उजड़ने से उनकी आजीविका भी चौपट हो गई है। सरकार हमारा भी विस्थापन करे।

अब ज्यादा बिजली पैदा करेगी परियोजना
डूब क्षेत्र वाली जोशियाड़ा बस्ती का विस्थापन न होने से अब तक बैराज जलाशय को समुद्र सतह से 1104 मीटर तक भरा जा रहा था, जिससे 304 मेगावाट की यह परियोजना 280 मेगावाट तक ही उत्पादन कर पा रही थी। अब जलाशय को 1108 मीटर तक भर कर परियोजना से क्षमता के अनुरूप विद्युत उत्पादन लिया जा सकेगा।

बांध की खातिर डूबा था टिहरी शहर
टिहरी बांध की खातिर टिहरी शहर भी इसी प्रकार डूब गया था। 29 अक्तूबर 2005 को शाम 7.33 बजे बांध की आखिरी टनल बंद कर दी गई थी। इसके बाद टिहरी शहर धीरे-धीरे डूबना शुरू हुआ था।
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