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हिमालयी राज्यों के लिए केंद्र में बने पृथक मंत्रालय

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पाणी राखो आंदोलन के प्रणेता और जाने माने पर्यावरणविद् सच्चिदानंद भारती का कहना है कि हिमालय को बचाने के लिए सबसे पहले हिमालय के गांवों को बचाना होगा। हिमालय को सहेजने के लिए उत्तराखंड ही नहीं समूचे देश के लोगों को आगे आने की जरूरत है। खाली होते हिमालय के गांवों में लोगों को बुनियादी सुविधाएं मुहैैैया करवाकर ही हिमालय को बचाया जा सकता है। उन्होंने हिमालयी राज्यों के लिए केंद्र में पृथक मंत्रालय बनने की बात कही।
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भारती का कहना है कि हिमालय की संवेदनशीलता को समझे बिना हिमालय को सहेजने की कल्पना नहीं की जा सकती है। एक ओर हिमालय के गांव खाली हो रहे हैं, वहीं ऑलवेदर समेत सड़कों का जाल बिछ रहा है। यह सिलसिला नहीं थमा तो पहाड़ की बाकी नदियां भी सूख जाएंगी या फिर बरसाती नदियों में तब्दील हो जाएंगी। ऐसे हालात में न गंगा बचेगी, न गोमुख बचेगा। उनका कहना कि सरकारें हिमालयवासियों के प्रकृति के साथ जीने के सदियों से चले आ रहे विज्ञान को समझें और उनके अनुरूप नीतियां बनाएं। हमें सड़कों के निर्माण से लेकर पर्यटन आदि सभी विकास योजनाओं में समझनी होगी। समय का तकाजा है कि अब संपूर्ण हिमालयी राज्यों के लिए केंद्र में पृथक मंत्रालय बनना चाहिए। विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक उपक्रमों की मदद से अनुसंधान एवं विकास की परियोजनाएं चलनी चाहिए। जिससे गांव कस्बे के कालेज भी अनुसंधान और विकास के काम में युुवाओं को जोड़ सकें।
हिमालयवासी भी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा: डा. किशोर चौहान
कोटद्वार। वर्ष 1995 से उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण और आपदा प्रबंधन पर काम कर रहे एनएचबी गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर डा. किशोर चौहान ने हिमालय दिवस मनाने की अवधारणा को अच्छा कदम बताया। उनका कहना है कि हिमालयवासियों और राज्य में काम करने वाली सरकारी और गैरसरकारी एजेंसियों को पर्यावरण संरक्षण के लिए अधिक संवेदनशील होकर धरातल पर काम करना होगा। सबसे पहले राज्य और केंद्र सरकार को हिमालयवासियों को भी पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा मानना चाहिए।
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डा. किशोर चौहान का कहना है कि वह 1995 से अब तक वन संरक्षण, वृक्षारोपण, पर्यावरण एवं आपदा प्रबंधन विषय पर उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल में 500 गांवों का सर्वेक्षण कर शोध कर चुके हैं। जिसमें केंद्र और राज्य की विभिन्न योजनाओं के तहत रोपित पौधों की दस फीसदी संख्या भी जीवित नहीं है। इसका बड़ा कारण यह है कि हम पौधारोपण के बाद उनके संरक्षण पर ध्यान नहीं देते। उनके संरक्षण के लिए भी हमारे पास कोई योजना नहीं है। रोपित पौधे आग लगने, सूखा पड़ने, पशु चरान, चुगान, सड़क निर्माण के चलते नष्ट हो रहे हैं। हिमालय के संसाधनों में स्थानीय लोगों को रोजगार देने की पर्याप्त क्षमता है, किंतु संसाधनों का सुनियोजित प्रबंधन नहीं हो पा रहा है। उन्होंने पशुपालन, जड़ी-बूटी उत्पादन और बागवानी को वैज्ञानिक एवं तकनीकी रूप से विकसित करने पर जोर दिया।
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