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सतपुली: नयार नदी में 1951 में आई थी बाढ़, नदी तट तक पहुंचा निर्माण

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पूर्वी नयार नदी के किनारे बसा सतपुली बाजार।संवाद
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कोटद्वार। पूर्वी नयार नदी के तट पर बसे सतपुली कस्बे के निचले इलाके में नदी तट पर कंकरीट के जंगल तेजी से बढ़ रहे हैं। नदी तट पर बने भवन बाढ़ के कारण खतरे की जद में हैं। 14 सितंबर, 1951 को नयार नदी में आई प्रचंड बाढ़ में जीएमओयू के 30 चालक-परिचालक नदी में समा गए थे। इसके बावजूद नदी तट पर भवनों का निर्माण जारी है। उत्तरकाशी के धराली बाजार में आई आपदा ने एक बार फिर नदी तटों पर हो रहे अनियोजित निर्माण की ओर लोगों का ध्यान खींचा है।

बीते दो-तीन दशक में सतपुली बाजार और आसपास के क्षेत्र की आबादी में भारी वृद्धि हुई। कस्बे के सुरक्षित स्थानों पर सभी जगह भवन निर्माण हो चुके हैं। इसके बाद नदी तट पर भी बड़ी तादात में भवन बनने शुरू हुए। हर बरसात में नयार नदी रौद्र रूप दिखा रही है। वर्ष 2010 में आई बाढ़ के कारण तटवर्ती इलाकों के कई भवनों में पानी घुस गया था। इससे पूर्व 14 सितंबर, 1951 को नयार नदी में आई बाढ़ में जीएमओयू के 30 चालक-परिचालक नदी में समा गए थे लेकिन वर्तमान में हर बरसात के सीजन में प्रशासन तटवर्ती इलाकों को नोटिस देकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर रहा है।
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1951 में हुई विनाशकारी तबाही पर बन चुके हैं गीत



पूर्वी नयार नदी में वर्ष 1951 में आई विनाशकारी बाढ़ से हुई तबाही हर किसी की जबान पर गीत के रूप में हैं। तब सतपुली बस अड्डा हाईवे 534 पर बने नयार पुल के पास हुआ करता था। 14 सितंबर, 1951 को पूर्वी नयार तट पर जीएमओयू के चालक-परिचालक बसें खड़ी कर आराम कर रहे थे। सब कुछ सामान्य था लेकिन आधी रात को को ढाई बजे नयार नदी ने विकराल रूप ले लिया। भयानक बाढ़ में 22 बसों में सो रहे 30 चालक-परिचालक बसों समेत नयार नदी में समा गए। इस घटना को उसे समय कई लोगों ने प्रत्यक्ष रूप में देखा था। कई चालकों परिचालकों ने बचने के लिए हाथ-पैर मारे लेकिन नदी के विकराल रूप के सामने उनकी एक न चली।
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