उत्तराखंड रंगमंच शताब्दी नाट्य महोत्सव में आयोजित जीतू बग्ड्वाल नाट्य के मंचन ने दर्शकों को गमगीन किया। नाट्य ने जीतू बग्ड्वाल की याद को ताजा किया तो दर्शकों की आंखें छलक उठी।
शनिवार को महोत्सव के पहले दिन संवेदना मंच उत्तरकाशी की ओर से गढ़वाली नाटक जीतू बग्ड्वाल की प्रस्तुति दी गई। नाटक के कथानक के अनुसार गढ़वाल रियासत की गमरी पट्टी क्षेत्र के बगोड़ी गांव में जीतू बग्ड्वाल का आस-पास के इलाके में आधिपत्य रहता है।
जीतू की अपनी तांबे की खाने थी और कारोबार तिब्बत तक फैला हुआ था। एक बार जीतू अपनी बहन सोबनी को लेने रैथल पहुंचता है। जहां वह जंगल में जाकर बांसुरी बजाने लगता है। बांसुरी की मधुर धुन से आछरी उसे हरने लगती हैं, लेकिन जीतू उन्हें वचन देकर छूट जाता है।
कुछ समय बाद जीतू अपने परिवार के साथ रोपणी के लिए खेतों में गया। यह वही दिन था जिसका वचन उसने आछरियों को दिया था। रोपणी के दौरान जीतू बेलों की जोड़ी के साथ खेतों में ही समा जाता है। इस घटना के बाद राजा जीतू के भाई को मरवा देता है और उसके परिवार के अन्य लोगों को जेल में डाल देता है, जिसके कारण राजा जीतू के कोप का शिकार हो जाता है।
उपचार के बाद जीतू के कोप से मुक्त होते ही राजा तुरंत उसकी मां और भाई को छोड़ने का निर्देश देता है। साथ ही ऐलान करता है कि आज से जीतू को पूरे गढ़वाल में देवता और रणभूत के रूप में पूजा जाएगा। नाटक का लेखन जयप्रकाश राणा और सह निर्देशन डा. अजीत पंवार ने किया। कलाकारों के जीवंत अभिनय व सशक्त पटकथा दर्शकों को बांधने में सफल रही।
उत्तराखंड के रंगमंच के सौ साल
उत्तराखंड रंगमंच ने 100 वर्ष का सफर तय कर लिया है। इस मौके पर नाट्य महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। गढ़वाल विवि के चौरास परिसर स्थित आडिटोरियम में महोत्सव का शुभारंभ करते हुए कुलपति प्रो. जेएल कौल ने कहा कि नाटक विचारों की अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है।
गढ़वाल विवि के ओएसडी प्रो. डीएस नेगी ने कहा कि इस प्रकार के आयोजनों से युवा वर्ग गढ़वाली इतिहास से रूबरू होता है। कार्यक्रम में दरी केदार समिति के अध्यक्ष गणेश गोदियाल, टीपीएस रावत, प्रो. एसएस रावत, डा. राकेश भट्ट, गणेश भट्ट आदि मौजूद रहे।