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हल चलाकर पहाड़ की भूमि को हरी-भरी कर रही भुवनेश्वरी

Tue, 07 Mar 2017 10:43 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, कोटद्वार
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यमकेश्वर के सरा गांव निवासी भुवनेश्वरी देवी। - फोटो : amar ujala
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आज के समय में जहां पुरूष खेती से मुंह मोड़कर रोजगार के लिए शहरों की दौड़ लगा रहे हैं। वहीं, यमकेश्वर के सरा गांव निवासी भुवनेश्वरी देवी अपने खेतों के साथ ही गांव के अन्य लोगों के खेतों को बंजर होने से बचाने में जुटी है। दिलचस्प बात यह है कि भुवनेश्वरी खेतों में खुद हल चलाती है। भुवनेश्वरी पहाड़ों से पलायन कर रहे युवाओं के लिए एक नजीर साबित हो रही है।     
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भुवनेश्वरी देवी (40) पिछले दस सालों से हल चलाकर खेती कर रही है। उनका कहना है कि हल चलाकर खेती करने में उसे आनंद मिलता है। वह बताती है कि पहाड़ों में वन्यजीवों के आतंक के चलते खेती किसानी बड़ी चुनौती बन गई है। लेकिन गांवों में खेतों को बंजर छोड़ना उसे ठीक नहीं लगा। शुरुआत में उसने बैलों से केवल अपने खेत हरे-भरे किए, लेकिन बाद में वह आसपड़ोस के लोगों के बंजर खेत भी करने लगी।

वर्तमान में वह गांव के आठ अन्य परिवारों के खेतों में भी हल चलाकर उन्हें बंजर होने से बचा रही है। भुवनेश्वरी देवी के पति की वर्ष 2014 में मृत्यु हो चुकी है। तब से वह अपने दो बेटों पवन सिंह तथा मानवेंद्र सिंह का खेती किसानी के बूते न केवल भरण-पोषण कर रही है, बल्कि उन्हें पढ़ाने के लिए स्कूल भी भेज रही है। हल चलाने में भुवनेश्वरी को कोई झिझक नहीं होती, बल्कि उन्हें इस काम में आनंद मिलता है। वेदों में भी खेती किसानी को पहला स्थान दिया गया है।
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उनके इसी कार्य के लिए वर्ष 2012-13 में महिला समाख्या द्वारा पुरस्कृत किया जा चुका है। भुवनेश्वरी का कहना है कि पहाड़ों से हो रहे पलायन को रोकने के लिए बातें तो बड़ी होती हैं, लेकिन इसे रोकने के लिए धरातल पर कुछ नहीं होता। पहाड़ के लोगों को पहाड़ में रोकने के लिए ठोस योजनाएं बनाने की जरूरत है। एक समय में पहाड़ों में जहां कभी खेतों में हरियाली लहलहाया करती थी, वहां आज कई नाली खेत बंजर पड़े हुए हैं। 
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