हर बार सीट बदलकर चुनाव लड़ने के लिए चर्चित रहे डा. हरक सिंह रावत के उस मिथक को इस बार भी बल मिला है कि उत्तराखंड राज्य गठन के बाद वह कोई चुनाव नहीं हारे। उन्होंने कोटद्वार में भी इतिहास रच दिया है। इस बार के चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी के रूप में हरक सिंह रावत ने कांग्रेस के गढ़ कोटद्वार में सेंधमारी कर बड़े अंतर से जीत हासिल कर सूबे के कद्दावर नेता और स्वास्थ्य मंत्री सुरेंद्र सिंह नेगी को हराया।
वर्ष 2012 में डा. हरक सिंह रावत को कांग्रेस ने रुद्रप्रयाग सीट से अपना प्रत्याशी बनाया था। तब उन्होंने रुद्रप्रयाग में अपने साढू भाई भाजपा के दिग्गज मातबर सिंह कंडारी को करीब डेढ़ हजार वोटों से पराजित किया था। इससे पहले वह दो बार लैंसडौन विधानसभा में भाजपा प्रत्याशी भारत सिंह रावत को हराकर विधानसभा पहुंचे थे। कोटद्वार विधानसभा कांग्रेस के लिए प्रतिष्ठापूर्ण सीट थी। इसी सीट से वर्ष 2012 में चुनाव लड़ चुके सुरेंद्र सिंह नेगी तत्कालीन मुख्यमंत्री मेजर जनरल बीसी खंडूड़ी (रिटा.) को हराकर प्रदेश में सुर्खियों में आए थे।
राजनीति के जानकारों के मुताबिक कोटद्वार जिला न बनने, गढ़वाल के प्रवेश द्वार में बस अड्डा और ट्रैफिक अव्यवस्थाएं, मेडिकल कालेज और कण्वाश्रम झील का आकार न लेना, लालढांग-चिलरखाल कंडी मार्ग का काम आगे न बढ़ पाने से लोग खासे नाराज थे। इस पर जनता ने सीधी चोट करते हुए कांग्रेस के दिग्गज प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह नेगी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया।
कोटद्वार विधानसभा में हरक सिंह रावत की जीत अब तक की सबसे बड़ी जीत है। बड़े अंतर से हुई हार कांग्रेस के लिए जहां किसी सदमे से कम नहीं है, वहीं भाजपा के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती है कि वह जन आकांक्षाओं पर खरा उतरने के लिए कितनी प्रतिबद्धता से कार्य करती है।