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शिक्षा का मतलब गांव छोड़ना नहीं : जोशी

Fri, 07 Oct 2016 10:35 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला श्रीनगर
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शुक्रवार को श्रीनगर पहुंची गांव बचाओ यात्रा - फोटो : amarujala
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पद्मश्री डा. अनिल जोशी ने कहा कि शिक्षा का मतलब गांव छोड़ना नहीं हैं। शिक्षा जोड़ने का काम करती है तोड़ने का नहीं। गांवों को बचाने के लिए साझा प्रयास करने होंगे। डा. जोशी शुक्रवार को गढ़वाल विवि के बिड़ला परिसर में छात्रों से संवाद कर रहे थे।
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पर्यावरणविद अनिल प्रकाश जोशी की गांव बचाओ यात्रा दल का शुक्रवार को गढ़वाल विवि के बिड़ला परिसर और स्थानीय गोला पार्क में जोरदार स्वागत किया गया। किया। इस दौरान गांवों से हो रहे पलायन पर चिंता जताते हुए अनिल जोशी ने छात्रों से गांवों को बचाने के लिए आगे आने का आह्वान किया। प्रो. जेपी पचौरी ने कहा कि गंगा यमुना के क्षेत्र में कोई जल उद्योग पनप नहीं पाया। यहां पानी की बोतलों को उद्योग होना चाहिए। प्रो. मृदुला जुगराण ने कहा कि प्रकृति हमारी आत्मा है और प्रकृति गांवों में बसती है।

छात्रों से संवाद करने के बाद डा. अनिल जोशी जुलूस के साथ गोला पार्क पहुंचे। यहां जनसभा में उन्होंने कहा कि राज्य निर्माण के 16 वर्षों बाद भी गांवों को तवज्जो नहीं दी गई। किसी भी सरकार ने गांवों को केंद्रित कर योजनाओं का निर्माण नहीं किया। अनिल जोशी ने कहा कि लोकतंत्र की भाषा में हम खरे नहीं उतरे हैं। गांवों को सिरे से नकारा जा रहा है। देश की पहचान गांव है। देश की 90 फीसदी आर्थिकी गांव से चलती है।
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हमारी जड़े गांव में ही हैं। डा. जोशी ने कहा कि पूरी दुनिया में भारत एक मात्र देश है जहां बड़े बांधों का निर्माण किया जा रहा है, जबकि दुनिया के अन्य देशों ने इन्हें नकार दिया है। इस मौके पर डा. मोहन पंवार, डा. अरविंद दरमोड़ा, प्रेम बल्लभ नैथानी, जगदंबा रतूड़ी, समीर रतूड़ी, डा. हिमानी, डा. द्वारिका सेमवाल, रागनी, सतेंद्र, शालिनी आदि मौजूद थे।

रावत के शासन में पनपे माफिया
श्रीनगर। पत्रकारों के सवाल के जवाब में पद्मश्री डा. अनिल जोशी ने कहा कि मुख्यमंत्री हरीश रावत भले ही स्वयं को गांव का पुत्र बताते हों लेकिन उन्होंने गांवों के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया। विकास के नाम पर केवल सरकारी शराब की दुकानें ही गांवों में खोली गई हैं। रावत के शासन काल में सबसे अधिक माफिया पनपे हैं। राज्य में शराब, खनन, जमीनों की खरीद फरोख्त बेतहाशा हुई है। पलायन की मार झेल रहे गांव खाली होते जा रहे हैं।
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