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चार संस्कृत विद्वानों को मिला पहला विद्यावारिधि सम्मान-201

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कोटद्वार। प्रसिद्ध श्री तिमली संस्कृत पाठशाला को वैदिक शिक्षा और अनुसंधान केंद्र के रूप में पुनर्स्थापना को लेकर वैचारिक गोष्ठी में संस्कृत पाठशाला केे एक बार फिर से संस्कृत विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने का संकल्प किया गया। इस अवसर पर आचार्य सुंदरलाल डबराल की स्मृति में संस्कृत के क्षेत्र में कार्य कर रहे चार विद्वानों को विद्यावारिधि सम्मान-2018 से सम्मानित किया गया।
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रविवार को डबरालस्यूं पट्टी के तिमली गांव में आयोजित समारोह का संस्कृत अकादमी हरिद्वार के पूर्व सचिव डा. बुद्धदेव शर्मा और तिमली विद्यापीठ की पूर्व छात्रा माधुरी डबराल बलूनी ने दीप प्रज्जवलित कर शुभारंभ किया। राजकीय जूनियर हाईस्कूल तिमली की छात्राओं ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।
इस अवसर पर संस्कृत के छेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए संस्कृत भारती के क्षेत्रीय संगठन मंत्री डा. प्रहलाद सिंह, संस्कृत भारती के संगठन मंत्री डा. प्रेमचंद शास्त्री, संस्कृत अकादमी हरिद्वार के पूर्व सचिव डा. बुद्धदेव शर्मा, संस्कृत निदेशालय के सहायक निदेशेक गढ़वाल डा. बाधश्रवा आर्य और विद्यापीठ की पूर्व छात्रा माधुरी डबराल बडूनी को प्रशस्तिपत्र, शॉल और फूल माला के साथ विद्यावारिधि सम्मान-2018 से सम्मानित किया गया।
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इस अवसर पर आयोजित गोष्ठी में समारोह संयोजक आशीष डबराल ने बताया कि श्री तिमली संस्कृत पाठशाला की स्थापना 1882 में हुई थी, तब से सन 1969 तक विद्यापीठ ने संस्कृत जगत में अनेक विद्वान प्रदान किए। ब्रह्मलीन जगतगुरू शंकराचार्य माधवाश्रमजी महाराज, आचार्य ललिता प्रसाद डबराल, पंडित सदानंद डबराल, ज्योतिषाचार्य पंडित वाणी विलास डबराल जैसे अनेक विद्वानों ने तिमली संस्कृत पाठशाला से संस्कृत की शिक्षा ली थी। उन्होंने पाठशाला की पुर्नस्थापना के लिए संस्कृत के छेत्र में कार्य कर रहे बुद्धिजीवियों से विद्यालय के विकास के लिए कार्य करने की अपील की। साथ ही उन्होंने सरकार से तिमली को हेरिटेज विलेज बनाने की मांग की।
तिमली विद्यापीठ की छात्रा रहीं माधुरी डबराल बलूनी ने कहा कि संस्कृत पाठशाला की पुर्नस्थापना ही सही माइने में अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि होगी। आचरण को शुद्ध रखना और दूसरों की कल्याण की भावना के साथ ही विद्यापीठ को आगे बढ़ाने की अपील की। डा. बुद्धदेव शर्मा ने नव संवत्सर के अवसर पर विद्यापीठ के पुर्नस्थापना पर गोष्ठी को शुभ बताया। कहा कि सरकार के माध्यम से पाठशाला के संचालन के लिए फंड दिलाने का प्रयास किया जाएगा। डा. प्रताप सिंह ने कहा कि अंग्रेज शासन काल से पहले संस्कृत में पूरी शिक्षा होती थी, एक बार फिर से संस्कृत को आम बोलचाल की भाषा बनाना होगा, इसके लिए संस्कृत भारती कार्य कर रही है।डा. प्रेम चंद्र शास्त्री ने कहा कि संस्कृत विद्यालयों की आवश्यकता को समझाना ंरकारी अधिकारियों को समझाना मुश्किल है। इसके लिए संस्कृत से ही मानव की संस्कृति जीवित है इसके लिए संस्कृत पाठशालाओं को आगे बढ़ाए जाना अति आवश्यक है। उन्होंने तिमली पाठशाला के लिए कार्य करने का आश्वासन दिया। संस्कृत निदेशक गढ़वाल डा. बाधश्रवा आर्य ने तिमली संस्कृत पाठशाला को प्रदेश में संस्कृत विश्वविद्यालय और अनुसंधान केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा।
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभात डबराल, डा. डीएन भटकोटी, डा. हर्षानंद उनियाल, डा. कुलदीप पंत, रोशन गौड़, डा. हेमा उनियाल, अनीता नौटियाल, नंदा डबराल, हृदय राम डबराल, अनुसुया प्रसाद काला, डा. कुलदीप पंत, ऋषि कंडवाल, संदीप डबराल, सुधाकर डबराल आदि मौजूद थे। समारोह का संचालन शंकर डबराल ने किया
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