कोटद्वार। आजादी के सत्तर साल बाद भी महर्षि कण्व की तपस्थली और देश को नाम देने वाले हस्तिनापुर के चक्रवर्ती सम्राट भरत की जन्मस्थली कण्वाश्रम अपनी पहचान की मोहताज है। केंद्र और अविभाजित यूपी सरकार ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया। उत्तराखंड को पृथक राज्य बने भी 17 साल बीत चुके हैं, लेकिन कण्वाश्रम के विकास के लिए जो अपेक्षित प्रयास शुरू होने चाहिए थे, वह नहीं हो सके। दो साल पहले कण्वाश्रम के विकास के लिए बनी झील निर्माण की योजना के नए साल में आकार लेने की उम्मीद बढ़ गई है। पर्यटन विभाग ने यहां झील और अन्य पर्यटन सुविधाएं विकसित करने का जिम्मा उत्तराखंड पर्यटन विकास परिषद को सौंपा है। इसके लिए करीब 15 करोड़ रुपये एशियन डेवलपमेंट बैंक (एडीबी) उपलब्ध कराएगा।
कोटद्वार से करीब 16 किमी दूर मालन नदी के तट पर स्थित कण्वाश्रम एक जमाने में वैदिक सभ्यता और शिक्षा का प्रमुख केंद्र रहा, लेकिन आजादी के बाद से यह उपेक्षित पड़ा है। प्रदेश को पर्यटन हब बनाने का दावा करने वाली उत्तराखंड की सरकारों ने भी इन सत्रह सालों में इस ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल की अनदेखी ही की है। कण्वाश्रम में पर्यटन विकास तो दूर राज्य सरकार बुनियादी सुविधाएं तक विकसित नहीं कर पाई है। आजादी से पहले और बाद के कई सालों तक यह स्थान पर्वतीय क्षेत्र की प्रमुख व्यावसायिक मंडी हुआ करती थी, जो बुनियादी सुविधा के अभाव में बाद में कलालघाटी शिफ्ट हो गई। अब कण्वाश्रम में क्षेत्रवासियों के प्रयास से हर साल वसंत पंचमी का मेला लगता है।
कण्वाश्रम का ऐतिहासिक महत्व
भारत को नाम देने वाले सम्राट भरत का जन्म स्थल आजादी के दौर से ही गुमनामी के अंधेरे में है। हिमालयी धरोहर अध्ययन केंद्र के निदेशक डा. पदमेश बुडाकोटी का कहना है कि 12वीं शताब्दी से कण्वाश्रम का पराभव शुरू हो गया था, जो आज तक जारी है। वह बताते हैं कि सन 1192 ईस्वी में दिल्ली में शासन स्थापित करने के बाद मोहम्मद गौरी ने देश के जिन धार्मिक स्थलों को तहस-नहस किया, उनमें कण्वाश्रम भी शामिल है। सन 1227 में इल्तुतमिश की सेना ने मंडावर, बिजनौर को लूटने के बाद कण्वाश्रम पर हमला किया। आजादी के बाद इसकी सुध लेने में देर हो गई।
कोट
कण्वाश्रम में झील निर्माण समेत अन्य पर्यटन सुविधाएं विकसित करने के लिए ग्रामीण पर्यटन विकास योजना के तहत करीब 20 करोड़ की योजना को एडीबी की ओर से मंजूरी मिली है। गत वर्ष अगस्त माह में बादल फटने के बाद मालन नदी में आई बाढ़ से उपजे हालात का विशेषज्ञों से सर्वे कराया गया है। झील की सुरक्षा के लिए एक अतिरिक्त रिटेनिंग वाल बनाई जाएगी। इस परियोजना का कार्य जनवरी अंतिम सप्ताह से ही शुरू कराने का प्रयास है।
-अमित भारद्वाज, परियोजना प्रबंधक यूटीडीबी
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