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2 साल से गौरेया को बचाने में जुटे हैं शिक्षक दिनेश कुकरेती

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कोटद्वार। घर आंगन में फुदकने वाली गौरेया या हाउस स्पैरो का वैज्ञानिक नाम पासर डोमेस्टिक्स है। आने वाले दिनों में गौरेया को बचाना बड़ी चुुनौती बन गया है। इसी समस्या से चिंतित भाबर निवासी शिक्षक दिनेेश कुकरेती 22 साल से उसके संरक्षण में जुटे हैं, अपने वेतन के पैसों से उसके लिए प्लाई का घोसला (नेस्ट) बनाकर निशुल्क बांट रहे हैं। बीते 22 साल में वह आठ हजार से अधिक घोंसले बनाकर लोगों को बांट चुके हैं।
दिनेश वर्तमान में जीआईसी द्वारी पैनो में गणित के सहायक अध्यापक के रुप में कार्यरत हैं। स्कूल की छुट्टी के बाद वह अपना समय इसी कार्य में लगाते हैं। भाबर क्षेत्र के नंदपुर निवासी शिक्षक दिनेश चंद्र कुकरेती ने अपने घर को ही गौरैया संरक्षण केंद्र में तब्दील कर दिया है। उनके घर में 100 से अधिक नेस्ट बॉक्स लगे हैं। वह गौरया संरक्षण के साथ ही उल्लू, मैना, रोबिन, हुदहुद आदि पक्षियों के संरक्षण के प्रति भी लोगों को जागरूक कर रहे हैं। उनके द्वारा बनाए गए घोंसले अब चिड़ियों की चहक से गूंजने लगे हैं।
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स्वस्थ पर्यावरण का संकेत है गौरैया
शिक्षक दिनेश कुकरेती बताते हैं कि गौरैया हमारे घरों के आस-पास कीट-पतंगों को खाकर उनकी संख्या सीमित करती है। यह चिड़िया हमारे बीच में हमारे साथ आबादी वाले क्षेत्रों में रहती है, जो मनुष्य और गौरैया के आपसी प्रेम को दर्शाती है। यह हल्के वजन एवं तीव्र श्वसन वाली प्राणी होने के कारण पर्यावरण में आए बदलाव का प्रभाव बहुत शीघ्र गौरैया पर दिखाई देता है।
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प्लाईवुड से बना नेस्ट सबसे सुरक्षित
प्लाईवुड से बना नेस्ट गौरैया के लिए सबसे सुरक्षित और उपयुक्त है। यह समतापी होने के कारण सभी ऋतुओं में जहां तापमान को सामान्य बनाए रखता है, वहीं, इसके अंदर आक्सीजन की पूर्ति आसानी से होती है। जबकि प्लास्टिक, लोहे की चादर, टीन के नेस्ट बॉक्स उतने उपयुक्त नहीं होते हैं। मिट्टी से बने घड़े, गुल्लक यदि सुरक्षित जगह में रखे हुए हैं, तो सही है, लेकिन वर्षाकाल में पानी पड़ने पर इसके अंदर नमी आ जाती है, जिससे तापमान बहुत कम हो जाता है, जो अंडों और बच्चों को नुकसान पहुंचा सकती है।
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