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कण्वाश्रम में परीक्षण उत्खनन को वन विभाग की मंजूरी का इंतजार

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कोटद्वार। महर्षि कण्व ऋषि की तपस्थली और चक्रवर्ती सम्राट भरत की जन्मस्थली कण्वाश्रम को राष्ट्रीय धरोहर बनाने की दिशा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की कवायद रंग लाने लगी है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के देहरादून मंडल के परीक्षण पुरातात्विक उत्खनन के प्रस्ताव को जहां नई दिल्ली स्थित महानिदेशालय से हरी झंडी मिल गई है, वहीं विभागीय अधिकारियों को अब उत्खनन के लिए वन विभाग की मंजूरी का बेसब्री से इंतजार है। एएसआई देहरादून मंडल की ओर से गत 28 मार्च को इस आशय का पत्र डीएफओ लैंसडौन और उच्चाधिकारियों को भेजा गया है।
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कण्वाश्रम विकास समिति की पहल पर गत जनवरी में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण देहरादून मंडल की अधीक्षण पुरातत्वविद् लिली धस्माना की अगुवाई में पुरातत्वविदों की एक टीम ने कण्वाश्रम का दौरा किया था। तब टीम ने वर्ष 2012 में निकली मूर्तियों के बारे में जानकारी हासिल करते हुए वहां परीक्षण पुरातात्विक उत्खनन के लिए कण्वाश्रम का नक्शा और साइट प्लान तैयार कर अपने महानिदेशालय को भेजा। अधीक्षण पुरातत्वविद् लिली धस्माना ने बताया कि महानिदेशालय से गत मार्च में ही कण्वाश्रम में परीक्षण पुरातात्विक उत्खनन की स्वीकृति प्रदान कर दी गई है। कण्वाश्रम में मृग विहार वाले जिस क्षेत्र से मूर्तियां निकली थीं, वह लैंसडौन वन प्रभाग के तहत आरक्षित वन क्षेत्र में पड़ता है। इसके लिए वन विभाग के डीएफओ से लेकर उच्चाधिकारियों से परीक्षण उत्खनन के लिए मंजूरी मांगी गई है। कण्वाश्रम विकास समिति के अध्यक्ष कमांडर बीएस रावत ने बताया कि समिति की ओर से वन मंत्री डा. हरक सिंह रावत से परीक्षण पुरातात्विक उत्खनन के लिए बरसात से पूर्व अनुमति दिए जाने का आग्रह किया गया है।

1000 साल पुराने मंदिर के अवशेष हैं कण्वाश्रम में निकली मूर्तियां
पुरातत्वविद् राजीव पांडे ने बताया कि इसी साल जनवरी में जब टीम ने कण्वाश्रम का दौरा कर नक्शा और साइट प्लान तैयार किया था। तब ऊपरी सतह को हटाने के बाद जो अवशेष नजर आए हैं, वे एक मंदिर के हैं। ये प्रथम दृष्टया 10 से 13वीं शताब्दी के प्रतीत होते हैं। उनका कहना है कि कण्वाश्रम में तब मंदिरों का समूह रहा होगा। कण्वाश्रम में वर्ष 2012 की बाढ़ में भूकटाव के साथ निकली मूर्तियां भी करीब एक हजार साल पुराने मंदिर के अवशेष हैं। ये शिलाखंड कत्यूरी राजवंश के समय के हैं, जिन्होंने गढ़वाल में 10 से 13वीं सदी तक राज किया था।
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