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आखिरी उम्मीद थी मां, बस हादसे में वह भी नहीं रही

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कोटद्वार/धुमाकोट। धुमाकोट बस हादसे ने अपोला गांव के तीन बच्चों की आखिरी उम्मीद उनकी मां को हमेशा के लिए छीन लिया। हादसे में इन बच्चों की मां बबली देवी (35) पत्नी स्व. सुखदेव ध्यानी की असमय ही मौत हो गई। चार दिन से ये बच्चे अपने बूढ़े नाना-नानी और चाचा-ताऊ की देखरेख में हैं। मां की मौत के बाद से बच्चों के आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। नाते-रिश्तेदार उनके आंसू पोछकर किसी तरह उनका मन बहलाने पर लगे हैं, लेकिन बच्चों को रह-रहकर मां की याद सता रही है।
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48 लोगों की जान लेेने वाले धुमाकोट बस हादसे ने कई बच्चों के सिर से उनके मां-बाप का साया हमेशा के लिए उठा लिया। ऐसा ही एक मामला नैनीडांडा ब्लॉक के ग्राम अपोला में सामने आया है। यहां सास-ससुर और पति की मौत के बाद किसी तरह बबली देवी पत्नी स्व. सुखदेव ध्यानी अपने तीन बच्चों सपना (11), साक्षी (9) और आकाश (8) का लालन-पालन कर रही थी। सपना जहां कक्षा नौ में पहुंच गई थी, वहीं साक्षी सातवीं और सबसे छोटा बेटा आकाश तीसरी में पढ़ाई कर रहा है। घर का खर्च चलाने के लिए बबली प्रांतीय रक्षक दल में नौकरी कर रही थी। इन दिनों वह धुमाकोट थाने में तैनात थी, लेकिन नियति को शायद यह भी मंजूर नहीं था। एक जुलाई को वह घर का काम निपटाने के बाद सुबह साढ़े सात बजे धुमाकोट आने के लिए उस बस में सवार हुई, जिसका सफर धुमाकोट पहुंचने से पहले ही क्वीन गांव के संगुड़ी गदेरे में खत्म हो गया। यहां से उसकी मौत की खबर घर पहुंची तो बच्चों की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। आखिरी सहारा छिन जाने के बाद तीनों बच्चों के समक्ष जीवनयापन के साथ ही उनकी देखरेख का भी सवाल खड़ा हो गया है।
बस हादसे में बच्चों की मां की मौत की खबर लगते ही उनके बूढ़े नाना-नानी उनके घर पहुंच गए हैं। बच्चों की देखभाल का जिम्मा नाना-नानी के साथ ही ताऊ देवेश और चाचा रूखदेव के कंधों पर आ गया है। हादसे की सूचना लगते ही उनके नाते रिश्तेदार गांव पहुंच गए हैं। बच्चों के दिल्ली निवासी दूसरे ताऊ संजय ध्यानी का प्रयास है कि बच्चों को जल्द से जल्द आर्थिक सहायता मिले, जिससे उनकी पढ़ाई और अन्य खर्च में मदद हो सके। इसके लिए वह तहसील में कागजी औपचारिकता जल्द पूरी करने में जुटे हैं।
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नियति के चक्रव्यूह में ये तीनों मासूम ऐसे फंस गए हैं कि शायद ही ताउम्र इससे उभर पाएं।

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