कोटद्वार। अंग्रेजी हुकूमत में बदरी-केदार यात्रा का प्रमुख मार्ग रहा कण्वाश्रम-सिमलना-पौखाल पैदल मार्ग आज बदहाल हो चुका है। चक्रवर्ती सम्राट भरत अपनी जन्मस्थली कण्वाश्रम के पास स्थित धूरा-भरपूर से पहली बार इसी मार्ग से राजधानी हस्तिनापुर गए थे। यही नहीं, वाल्मीकि रामायण और महाभारत में भी इस मार्ग का उल्लेख है। वर्ष 1952 में पौड़ी की जिला पंचायत ने इस मार्ग की मरम्मत कर इसे अश्व मार्ग में तब्दील किया था। तब इसे राजबाट कहते थे।
महर्षि कण्व की जन्मस्थली और देश को नाम देने वाले हस्तिनापुर के चक्रवर्ती सम्राट राजा भरत की जन्मस्थली कण्वाश्रम (चौकीघाट) से उत्तर दिशा में सिमलना होते हुए पौखाल तक जाने वाला पैदल मार्ग आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। एक जमाने में इसी मार्ग से अजमेर पट्टी के पोखरी, सिमलना, मथाणा, ईड़ा, कांडई, बल्ली, चूना महेड़ा समेत पौखाल तक दर्जनों गांवों के लिए आवाजाही होती थी। मालन घाटी के किनारे होते हुए तीर्थयात्री यहां से ही बद्रीनाथ-केदारनाथ की यात्रा करते थे। इसकी महत्ता को देखते हुए पौड़ी जिला पंचायत ने कण्वाश्रम से मथाणा सिमलना होते हुए पौखाल तक छह फुट पैदल-अश्व मार्ग का निर्माण कराया था। क्षेत्रवासी इसी अश्व मार्ग को मोटर मार्ग में तब्दील करने की मांग कर रहे हैं। वर्ष 2015 में तत्कालीन सीएम हरीश रावत ने इस मार्ग के निर्माण की घोषणा भी की, लेकिन मोटर मार्ग तो दूर अब यह पैदल मार्ग भी नहीं बचा।
मालन नदी के इतिहास पर शोध कर चुुके अनुसूया प्रसाद काला ने बताया कि इस मार्ग पर मालन नदी के उद्गम स्थल तक दर्जनों विशाल आश्रम स्थित थे। इसके चलते इस मार्ग को स्थानीय भाषा में तब राजबाट कहा जाता था। प्रकृति प्रेमी अमित सजवाण, दिनेश गौड़ और चंद्रमोहन बिंजोला का कहना है कि कण्वाश्रम के आईकानिक प्लेस घोषित होने के बाद इस मार्ग के ट्रेकिंग रूट के रूप में विकसित होने की उम्मीद बलबती हो गई है, लेकिन इससे पहले सरकार को पुराने अश्व मार्ग की मरम्मत करनी चाहिए।
कण्वाश्रम-सिमलना-पौखाल अश्वमार्ग की बदहाली की जानकारी नहीं है। जल्द ही यहां इंजीनियरों को भेजा जाएगा। इसके रखरखाव के लिए प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।
-संतोष खेतवाल, प्रभारी एएमए जिला पंचायत पौड़ी
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