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यह गंगा नहीं तो कहां आए थे हरि

Sun, 19 Mar 2017 10:11 PM IST
कौशल सिखौला हरिद्वार
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हर की पैड़ी से बहने वाली जिस गंगा को उत्तराखंड सरकार बाकायदा शासनादेश जारी कर नहर बता रही है, वहीं गंगा स्नान के लिए भगवान शिव और नारायण हरि विष्णु स्वयं आए थे। गंगा आगमन से पहले इसी स्थल पर सृष्टि रचियता अनादि ब्रह्मा ने कुंड की स्थापना की थी। जिन विक्रमादित्य के नाम से नव संम्वत्सर मनाते हैं, उन्हीं उज्जयनी नरेश के बड़े भाई राजा भृर्तहरि ने इसी स्थल पर बैठकर भृर्तहरि की पैड़ी स्थापित कराई थी। कालांतर में वही हर की पैड़ी के नाम से विख्यात हो गई।  
     
कर्नल प्रोबी कॉटले ने वर्ष 1845 में दूसरे भगीरथ के रूप में जब गंगा नहर निकालने की योजना बनाई, तब तक मनसा देवी पर्वत से लेकर चंडी देवी पर्वत तक केवल गंगा बहती थी। न कोई बस्ती थी और न कोई बाजार। ऋषिकेश की ओर जाने के लिए दोनों पहाड़ियों से होकर जाने वाले पैदल मार्ग ही थे। अन्य वाहन रुड़की से देहरादून के रास्ते समूचे गढ़वाल जाते थे। 2074 वर्ष पूर्व उज्जैन के राजा भृर्तहरि ने मनसा देवी पर्वत पर बैठकर तपस्या की थी। उन्होंने राजपाठ त्याग कर पूरा जीवन विरक्त के रूप में यहां बिताया। भृर्तहरि ने ही पर्वत से ब्रह्मकुंड तक सीढ़ियों और एक संकरे पैदल मार्ग की स्थापना कराई। इन सीढ़ियों को भृर्तहरि की पैड़ी कहा जाता था। भृर्तहरि के निधन के बाद राजा विक्रमादित्य ने इन सीढ़ियों को हर की पैड़ी नाम दिया। यही वह स्थल है, जहां विष्णु के आने से मायापुरी का नाम हरिद्वार और शिव के आने के कारण हरद्वार पड़ा। सृृष्टि नियंता ब्रह्मा ने अपने पुत्र दक्ष प्रजापति के साथ मिलकर इसी स्थल पर गंगा आगमन से पहले ब्रह्मकुंड तीर्थ की स्थापना की थी।  
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कर्नल प्रोबी कॉटले ने जब मायापुर से कानपुर तक गंगा नहर निकाली तब उन्होंने अनेक रास्तों और घाटों का निर्माण कराया। हर की पैड़ी पर गंगा को यथावत बहाने के लिए वर्तमान सर्वानंद घाट के पास एक अविछिन्न धारा भी छोड़ दी। हर की पैड़ी और ब्रह्मकुंड स्थल गंगा के अनादि तीर्थ हैं। इन्हीं के समीप ऋषि दत्तात्रेय की तप स्थली कुशावर्त, भगवान राम से जुड़ा रामघाट तथा विष्णु से जुड़ा विष्णु घाट मौजूद है। इस स्थल को नहर बताना एक बड़ी भूल है।      
     
माफियाओं के दबाव में जारी होते रहे शासनादेश      
वर्ष 1996 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि गंगा के 200 मीटर क्षेत्र में कोई निर्माण नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड बनने के बाद ऐसा ही आदेश नैनीताल उच्च न्यायालय ने भी किया। तब से भूमाफिया चंडी पर्वत के नीचे से बहने वाली नीलधारा को असली गंगा और हर की पैड़ी से बहने वाली गंगा को गंगा नहर कहने का प्रयास करते आए हैं। जबकि गंगा नहर को कर्नल कॉटले ने हर की पैड़ी से नहीं अपितु मायापुर से निकाला था।       
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शताब्दी पूर्व हुआ था विराट आंदोलन      
अंग्रेज सरकार ने जब भीमगोड़ा के सामने गंगा पर देश का पहला बांध बनाने की तैयारी की तो वर्ष 1914 में हरिद्वार के पंडों तथा महंतों ने आंदोलन शुरू कर दिया। तर्क था कि बंधे जल में कर्मकांड नहीं कराया जा सकता। आंदोलन इतना बढ़ा कि काशी से आकर महामना मालवीय ने आंदोलन की बागडोर संभाली। यह आंदोलन दो वर्ष तक चला। 1916 में स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि ब्रिटिश सरकार के खिलाफ देश की 25 रियासतों से सेनाएं अंग्रेजों को रोकने के लिए हरिद्वार आ गई। तब ब्रिटिश सरकार झुकी और बांध को वहां से हटाकर नीलधारा पर बांध के बजाय बैराज के रूप में बनाया गया। तब भी अविछिन्न धारा को हर की पैड़ी आने के लिए अविरल छोड़ दिया गया।     
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