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आज मावा मलाई हरिद्वार के हिस्से

Sun, 08 Nov 2015 12:44 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला/हरिद्वार
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हरिद्वार। राज्य में सर्वत्र वर्षगांठ का जश्न मनाया जा रहा है। जब राज्य का गठन हो रहा था तब हरिद्वार जनपद सुलग रहा था। वक्त की बलिहारी कि राज्य बनने के बाद सारी मावा मलाई हरिद्वार के हिस्से आ गई है। देहरादून के साथ हरिद्वार जनपद ने भी नया राज्य बनने का सर्वाधिक सुख भोगा है।
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यह सर्वविदित है कि हरिद्वार जनपद की जनता उत्तराखंड में नहीं मिलना चाहती थी। इसे तब बल मिला जब कल्याण सिंह, मुलायम सिंह और मायावती की तीन सरकारों ने अलग अलग चार प्रस्ताव केन्द्र को भेजे। ये सभी प्रस्ताव उत्तर प्रदेश विधान सभा द्वारा परित किए गए थे। सर्वसम्मत प्रस्तावों में हरिद्वार विहीन उत्तराखंड राज्य की मांग केन्द्र से की गई थी। हरिद्वार में उत्तराखंड में शामिल होने के विरुद्घ 1996 से आंदोलन शुरू हो गए थे। इन आंदोलनों को किसान नेता महेन्द्र सिंह टिकैत तथा नरेश अग्रवाल जैसे नेताओं ने हरिद्वार के नेताओं के साथ मिलकर और हवा दी थी। आलम यह था कि जिस रात उत्तराखंड राज्य की नींव रखी जा रही थी, उस दिन हरिद्वार में दर्जनों स्थानों पर आगजनी की गई थी और रेलगाड़ियां रोक दी गई थी।

जनपद के विरोध के बावजूद हरिद्वार नये राज्य में शामिल हो गया। कुछ ही दिनों में हरिद्वार वासियों ने रुख पलट दिया। यहां के नेता और लोग नये राज्य की आनंद लूटने लगे। राजधानी से बेहद नजदीकी नेताओं को बहुत रास आई। औद्योगिक क्षेत्र सिडकुल बन जाने के बाद तो हरिद्वार की काया पलट गई। हजारों को रोजगार मिला और जनपद की रंगत बदलती चली गई। आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से हरिद्वार बेहद सशक्त हो गया। 15 वर्षों में राज्य की अधिकांश मलाई हरिद्वार वालों के हिस्से आ गई। अब वे लोग भी मुख्य धारा में शामिल हो गए है जो राज्य बनते समय आगजनी कर रहे थे। उत्तराखंड ने सचमुच हरिद्वार वासियों की तकदीर बदल दी है।
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जिले के पौ बारह, तीर्थ जस का तस
हरिद्वार। राज्य बनने पर यह जरूर है कि मूल तीर्थ जस का तस रह गया। यद्यपि पूरे जिले के पौ बारह हो गए है। दो पहाड़ियों के बीच और गंगा के समानांतर बसा मूल तीर्थ जरा भी नहीं बदला। भौगोलिक परिवेश बदलने के लिए कोई कोशिश भी नए राज्य द्वारा नहीं की गई। नतीजा यह कि मूल तीर्थ जैसा था वैसा रह गया। इस नगर को कभी जापानी तो कभी कनेडियन योजनाएं मिलने वाली थी। वे सब यूपी में ही रह गई। काशी, आगरा, कांचिपुरम, रामेश्वरम आदि की भांति विश्व धरोहर नगरी का दर्जा भी हरिद्वार को नहीं मिल पाया। यद्यपि हरिद्वार देश की सात प्राचीनतम पुरियों में से एक है।

नेताओं ने छुए नये मुकाम
हरिद्वार। जितने भी नेता हरिद्वार को उत्तराखंड में देने के विरोधी थे वे सभी ऊंचे पद ग्रहण कर चुके है। कईं विधायक बने है तो कईं को लालबत्तियां मिली है। राज्य बनने के बाद हरिद्वार, भगवानपुर, लक्सर और रुड़की के नये औद्योगिक क्षेत्रों में ऐसे कईं नेताओं ने अपने उद्योग भी खड़े कर लिए हैं। राज्य बनने के बाद जिले में प्रॉपर्टी डीलर्स की बाढ़ आ गई है। इन डीलर्स का 70 प्रतिशत भार वे नेता उठा रहे हैं जो हरिद्वार को उत्तराखंड में देने का घोर विरोध कर रहे थे। अब सभी के धंधे मजे में चल रहे हैं।
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