आईआईटी से बाहर निकाले जाने के बाद से छात्र और उनके अभिभावक तनाव में आ गए हैं। अभिभावकों को अपने को संभालने के साथ-साथ इस बात की भी जिम्मेदारी है कि उनके बच्चे कहीं कोई गलत कदम न उठा लें। बुधवार की रात को फैसला आने के बाद एक छात्र संस्थान से चुपचाप निकल गया।
उसके माता-पिता को भनक लगी तो वह भी उसे तलाशते हुए संस्थान से बाहर आ गए। उन्हें उनका बेटा गंगनहर पुल के पास मिला। इसके बाद मां की तबियत बिगड़ गई और उन्हें आईआईटी के अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। आईआईटी में छात्रों को लेकर बुधवार को होने वाली सीनेट की बैठक से एक दिन पहले ही कई अभिभावक रुड़की पहुंच गए थे।
फैसला कहीं उनके बच्चों पर भारी न पड़े। इसे लेकर अभिभावक और छात्र दिन रात तनाव झेल रहे हैं। फैसला आने के बाद से अभिभावकों की आंखों में आंसू है और बच्चे सहमे हुए हैं। बुधवार की रात को तनाव के चलते एक छात्र अपने माता पिता को बिना बताए संस्थान से बाहर निकल गया और सोलानी नदी के पुल पर पहुंच गया।
पीछे-पीछे उसे ढूंढते हुए उसके माता-पिता भी पहुंच गए और उसे समझा बुझाकर संस्थान ले आए। यहां आकर मां अलका की तबियत बिगड़ गई। जिन्हें आईआईटी के अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहीं एक अभिभावक ने बताया कि उनका बेटे ने नोटिस मिलने के बाद से ही खुद को कमरे में बंद कर लिया है।
वह न तो किसी से बोल रहा है और न ही कुछ खा पी रहा है। बृहस्पतिवार को भी अभिभावक बेहद तनाव में नजर आए।
नहीं बचेंगे उनके लाड़ले
दुखी अभिभावकों ने बृहस्पतिवार को संस्थान निदेशक से मिलने की काफी कोशिश की। लेकिन, अन्य अधिकारियों से ही मुलाकात कर सके। कुशीनगर निवासी एक अभिभावक दिलीप कुमार ने यहां तक कहा कि यदि ऐसा ही रहा तो न उनके लाड़ले बचेंगे और न ही मां-बाप। यही हाल अन्य अभिभावकों का भी था।
क्या कहते है मनोवैज्ञानिक
आईआईटी की मानविकी विभाग की प्रोफेसर रेनू रस्तोगी का कहना है कि ऐसी स्थिति में तनाव स्वाभाविक है। ऐसे में अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वह बच्चों की काउंसिलिंग करें। उन्हें समझाएं उनके लिए अभिरुचि के अनुसार कई अवसर हो सकते हैं। बच्चों पर सबसे ज्यादा असर उनके माता पिता की बातों का होता है।
ऐसे में माता-पिता ही उनके सबसे बड़े साथी बन सकते हैं जो उन्हें इस तनाव से उबार सकते हैं। कहा कि अभिभावकों को आईआईटी में एडमिशन को प्रतिष्ठा से जोड़कर नहीं देखना चाहिए। यही उन्हें बच्चों को भी समझाना चाहिए।
गलत है सीनेट का फैसला
अभिभावकों का कहना था कि सीनेट का यह फैसला गलत है। बच्चों के भविष्य को ध्यान में रखकर फैसला नहीं लिया गया है। इससे बच्चे आईआईटी जैसे संस्थानों में प्रवेश लेने से भी डरेंगे। इनका कहना था कि उन्होंने बच्चों को पढ़ाने के कई लाख खर्च किए, लेकिन संस्थान ने उन्हें क्या दिया।
एक अभिभावक का आरोप था कि देश की किसी भी आईआईटी में इस तरह का नियम लागू नहीं है कि उन्हें पहले ही साल में बाहर निकाल दिया जाए।
नहीं दी थी नए नियम की जानकारी
छात्रों का कहना था कि उन्हें क्लास के प्रोफेसर और यहां तक कि एचओडी ने भी इस बात की जानकारी नहीं दी कि पांच सीजीपीए से कम अंकों पर उन्हें निकाल दिया जाएगा। छात्र अनुराग ने बताया कि उन्होंने कई बार इस बारे में बात करने की कोशिश की। लेकिन, किसी ने भी ऐसे नियम के बारे में नहीं बताया।
अनुराग का कहना था कि आईआईटी में सीजीपीए क्लास के टॉपर्स के अंकों के आधार पर निर्धारित होता है। ऐसे में कई बार अच्छा करने के बाद सीजीपीए कम रह जाता है। छात्रों का कहना था कि उनसे भी कहीं न कहीं लापरवाही हुई है, लेकिन उन्हें एक मौका मिले तो वह अच्छे सीजीपीए लाकर दिखाएंगे।
छात्र राज, रवि, प्रकाश आदि छात्रों का कहना था कि देश की किसी भी आईआईटी में छात्रों को बाहर नहीं निकाला जाता बल्कि उन्हें आगे के लिए मौका दिया जाता है।
विकलांग छात्र के पास नहीं थे शब्द
राजस्थान निवासी विशेष आवश्यकता वाले छात्र राजकुमार मीणा भी उन छात्रों में से एक हैं। जिन 73 छात्रों को संस्थान से बाहर निकालने का आदेश सुनाया गया है। राजकुमार इस फैसले के बाद से अवाक है। वह ज्यादा कुछ नहीं बोल पा रहा था। उसका कहना था कि उन्हें मौका दिया जाना चाहिए था।
बताया गया है कि 73 छात्रों में से करीब 45 छात्र एससी-एसटी वर्ग के हैं। जबकि इनमें छह लड़कियां भी शामिल है।
अंग्रेजी में कमजोर बच्चे पिछड़ जाते
आईआईटी जैसे संस्थान के हार्ड सेलेब्स को समझाने में अंग्रेजी माध्यम भी रोड़ा साबित होता है। अभिभावक दिलीप कुमार का कहना था कि बिहार आदि क्षेत्रों से आने वाले छात्र अंग्रेजी में कमजोर होते हैं। ऐसे में उन्हें अलग से क्लास देनी चाहिए।
आईआईटी के बंद हो जाएंगे दरवाजे
यदि एग्जिक्यूटिव कमेटी की बैठक के बाद भी इन छात्रों को निकाल दिया जाता है तो भविष्य में दोबारा यह छात्र आईआईटी में प्रवेश नहीं ले सकेंगे। हालांकि एनआईटी सहित अन्य इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश के लिए छात्र प्रयास कर सकते हैं।
इस बाबत आईआईटी की डिप्टी रजिस्ट्रार एकेडमी शीबा रमोला का कहना है कि किसी छात्र किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में भाग ले सकते हैं। उसमें कोई रुकावट नहीं होनी चाहिए। वहीं द्रोणाचार्य इंस्टीट्यूट के निदेशक राजीव कुमार ने बताया कि आईआईटी एडवांस में बैठने के लिए 12वीं के बाद एक साल तक इसमें बैठा जा सकता है। ऐसे में इन छात्रों को आईआईटी में प्रवेश की सुविधा नहीं मिल सकेगी।
चलाई जाएगी स्पेशल क्लास
संस्थान के डीन स्टूडेंट वेलफेयर प्रो. डीके नौडियाल ने बताया कि संस्थान ने निर्णय लिया है कि जिन विषयों में छात्र बेहतर अंक नहीं ला पा रहे हैं। ऐसे छात्रों के लिए शनिवार और रविवार को स्पेशल क्लास चलाई जाएगी। इसके लिए प्रोफेसरों और वरिष्ठ छात्रों का एक ग्रुप बनाया जाएगा। जो छात्रों को मदद देगा।