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कड़ाके की ठंड में हाईपोथर्मिया से रहे बचकर

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बस अड्डे के पास अलाव सेंकते लोग। - फोटो : HARIDWAR
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ठंड और धुंध का सबसे अधिक असर बच्चों व बूढ़ों पर ही होता है। लगातार उठते-गिरते पारे से हाइपोथर्मिया का खतरा बढ़ जाता है। काफी देर तक हाइपोथर्मिया की स्थिति बनी रहने पर मरीज की मौत भी हो सकती है। इसलिए हाइपोथर्मिया से बचाव जरूरी है।
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जिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शशिकांत ने बताया कि ठंड के मौसम में शरीर का तापमान अचानक गिरने की स्थिति को हाइपोथर्मिया कहा जाता है। वे बताते हैं कि शरीर की सभी क्रियाएं सुचारु रूप से चलें। इसके लिए शरीर का तापमान सामान्य होना जरूरी है, लेकिन काफी देर तक ठंड में रहने और महिलाओं के पानी में लगातार काम करने के चलते शरीर का तापमान सामान्य से बेहद कम हो जाता है। यह स्थिति हाइपोथर्मिया कहलाती है। उन्होंने बताया कि काफी देर तक इस स्थिति में रहने से मरीज की मौत भी हो सकती है। डॉ. शशिकांत ने बताया कि हाइपोथर्मिया के अटैक से मरीज की सांसें एकदम धीमी हो जाती है। मरीज का शरीर ठंडा पड़ने लगता है। कंपकंपी शुरू हो जाती है। त्वचा का रंग लाल पड़ने लगता है। इसका प्रभाव ज्यादातर नवजात बच्चों या कमजोर हो चुके बुजुर्गों पर भी पड़ता है। ज्यादातर ऐसे बुजुर्ग जो शुगर, दमा, थाइराइड, सांस या दिल के मरीज होते हैं, उनमें हाइपोथर्मिया होने का ज्यादा खतरा बना रहता है।
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क्या है बचाव
- कोहरे और ठंड में बच्चे और बूढ़े घर से बाहर न निकलें।
- पर्याप्त संख्या में गर्म कपड़े पहनें।
- पौष्टिक गर्म और तरल पदार्थ जैसे चाय या काफी लें।
- अचानक ठंड का असर दिखे तो हीटर या आग जलाकर हाथ पैर सीने की सेंकाई करें।
- परेशानी बढ़ने पर चिकित्सक को दिखाएं।
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