शांतिकुंज प्रमुख डा. प्रणव पंड्या ने कहा कि संस्कारों से श्रेष्ठतम संस्कृति का निर्माण होना चाहिए। संस्कृति अध्यात्म का पर्याय है। संस्कृतिनिष्ठ व्यक्ति ही सही मायने में समाज के विकास में योगदान दे सकते हैं।
डा. पंड्या सोमवार को शांतिकुंज में हुई भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के समन्वयकों की तीन दिवसीय राष्ट्रीय गोष्ठी के याभारंभ सत्र को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि अध्यात्म रूपी सुसंस्कृत व्यक्ति को विज्ञान रूपी सभ्यता उन्हें जीवन की मूलभूत आवश्यकता को पूरा करने की विधि सिखाती है। दोनों के समन्वय से ही समाज का चहुंमुखी विकास हो सकता है। उन्होंने कहा कि युवाओं को परिस्थितियों का दास नहीं बल्कि बाधाओं को चीरकर रास्ता बनाने वाला होना चाहिए। कहा कि शांतिकुंज परिवार भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के माध्यम से ऐसे युवाओं की फौज तैयार कर रहा है। ऐसे संस्कृतिनिष्ठ युवा ही समाज का भविष्य तय करेंगे।
इस अवसर पर डा. पंड्या ने राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा कराने वाले राजस्थान के जिला राजसमंद को पहला तथा जिला बांसवाड़ा को दूसरा स्थान मिलने पर उनके संयोजकों को स्मृति चिह्न तथा प्रशस्ति पत्र भेंटकर सम्मानित किया।
इससे पहले शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्त्ता वीरेश्वर उपाध्याय ने युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ने के अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि लक्ष्य निर्धारण करने तथा उन्हें प्राप्त करने की दिशा में सार्थक पहल विद्यार्थी जीवन में होती है। संगोष्ठी के समन्वयक डा. पीडी गुप्ता ने बताया कि संगोष्ठी में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मध्यप्रदेश सहित 17 प्रांतों के 350 से अधिक जिला और प्रांतीय समन्वयक भाग ले रहे हैं।