गौरेया के लिए घोंसला खरीदने के बजाए कई लोग अब स्वयं घोंसले बनवा रहे हैं। इसके लिए घर में बचे लकड़ी और प्लाई के टुकड़ों का प्रयोग किया जा रहा है। जिन घरों में अभी तक घोंसले लगाए गए हैं, उनमें से कई घरों में गौरैया की चहचहाट शुरू हो गई है।
मॉडल कालोनी में रहने वाले भेल से सेवानिवृत्त अधिकारी एसके त्यागी ने बताया कि उनके घर पर लकड़ी और प्लाई के टुकड़े पड़े हुए थे। उन्होंने मिस्त्री को बुलाकर इन टुकड़ों से गौरैया के लिए घोंसले तैयार करने को कहा है। पांच-छह घोंसले तैयार होंगे, जिन्हें घर में ही लगाए जाएंगे।
उन्होंने सुझाव भी दिया कि जिन लोगों ने घोंसले लिए हैं, उन्हें अपने घर पर उचित स्थान देखकर इन्हें लगाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि कई लोग ऐसे भी है जो घोंसले ले आते हैं लेकिन इन्हें लगाते नहीं या फिर सही जगह नहीं लगाते। दूसरी ओर कई घरों में गौरैया की चहचहाट सुनाई देनी लग गई है।
ज्वालापुर निवासी प्रदीप अग्रवाल ने 15 दिन पहले घोंसला खरीदा था, उन्होंने बताया कि तीन दिन से उनके घर में गौरैया ने आना शुरू कर दिया है। जगजीतपुर निवासी राकेश शर्मा ने बताया कि उन्होंने एक महीना पहले घोंसला लिया था। कई दिन से गौरैया आ रही है।
पक्षी वैज्ञानिक प्रो. दिनेश भट्ट ने बताया कि जिन लोगों ने मई-जून माह में घोंसले लगाए हैं, उनमें से करीब 40 फीसदी घोंसलों में गौरेेया ने वास कर लिया है।