कल (मंगलवार) से पितृ पक्ष शुरू हो रहे हैं। बुधवार शाम अस्त होते ही पितृगण धरती पर आ जाएंगे और 16 दिनों तक पितरों की तिथियों के अनुसार उनको हव्य, कव्य और जल प्रदान करेंगे। गंगा आदि पवित्र नदियों के तटों के अलावा घरों में भी तर्पण दिए जाएंगे।
मान्यता है कि तिथि के अनुसार अपने पितृ को मध्याह्न काल में यथा योग्य हव्य, कव्य दिया जाना चाहिए। मध्याह्न काल दोपहर 12 बजे से दो बजे तक माना जाता है। यदि पास में धन है तो कई पंडितों को पितरों के निमित्त जिमाया जाता है। पंडितों के अलावा धेवते को भी पंडित की मान्यता शास्त्रों ने दी है। यदि पास में कुछ न हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुख कर आंसू बहाने से भी पितृगण तृप्त हो जाते हैं। बहुत गरीबी हो तो केवल पितरों का स्वरूप स्मरण करने से उनको पुत्र और पौत्र का हव्य प्राप्त हो जाता है। मान्यता है कि एक दिन पहले सूर्य अस्त होने के साथ उसकी रश्मियों पर बैठकर पितृ धरती पर आते हैं। जिन पितरों की तिथि याद न हो उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है। पूर्णिमा के दिन मरने वाले पितरों का श्राद्ध भाद्रपद पूर्णिमा को होता है।
विधवा महिला भी कर सकती है तर्पण
भारतीय प्राच्य विद्या सोसायटी के अध्यक्ष और ज्योतिषाचार्य प्रतीक मिश्रपुरी बताते हैं कि श्राद्ध कर्म के दिन बाल और नाखून ना काटें और बिना सिले स्वच्छ वस्त्र जैसे धोती पहनें। पोतों से अधिक नाती को भोजन कराना पितरों को संतुष्ट करता है। सबसे अधिक पुण्य उसे मिलता है, जो अपने माता पिता की ही भूमि पर श्राद्ध करता है। पतिृ उसी भूमि पर आते हैं जो उनकी होती है। नाना नानी का श्राद्ध पिता की भूमि पर नहीं हो सकता है। यदि अपना मकान बेच दिया हो तो किसी भी तीर्थ पर श्राद्ध किया जा सकता है। परिवार में किसी पुरुष के न होने पर विधवा महिला भी तर्पण दे सकती है। श्राद्ध में तिल, चावल और जौ को अवश्य शामिल करना चाहिए। अपने पितरों को पहले तिल अर्पण करें उसके बाद भोजन की पिंडी बनाकर चढ़ाएं। पितृपक्ष में कौवों को पितरो का रुप माना जाता है। इसलिए कोवौं को भोजन अवश्य डालें। गाय और कुत्ते को भी भोजन कराएं।
पितृ पक्ष का महत्व
पितृदोष से मुक्ति के लिए पितरों का तर्पण कर उनका आशीर्वाद लेना चाहिए। इससे जीवन में आने वाले कष्ट दूर होते हैं। कुंडली में लगने वाला पितृदोष व्यक्ति को नुकसान पहुंचता उसका कोई भी कार्य सफल नहीं होता। कहा जाता है कि इस समय पूर्वज पृथ्वी पर होते हैं, इसलिए पितृपक्ष में उनका श्राद्ध करने से वे अपना आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
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पहला श्राद्ध (पूर्णिमा श्राद्ध) -1 सितंबर 2020
दूसरा श्राद्ध -2 सितंबर
तीसरा श्राद्ध -3 सितंबर
चौथा श्राद्ध -4 सितंबर
पांचवा श्राद्ध -5 सितंबर
छठा श्राद्ध -6 सितंबर
सातवां श्राद्ध -7 सितंबर
आठवां श्राद्ध -8 सितंबर
नवां श्राद्ध -9 सितंबर
दसवां श्राद्ध -10 सितंबर
ग्यारहवां श्राद्ध -11 सितंबर
बारहवां श्राद्ध -12 सितंबर
तेरहवां श्राद्ध -13 सितंबर
चौदहवां श्राद्ध -14 सितंबर
पंद्रहवां श्राद्ध -15 सितंबर
सौलवां श्राद्ध -16 सितंबर
सत्रहवां श्राद्ध -17 सितंबर (सर्वपितृ अमावस्या)