कच्चे केले को पकाने के लिए मंगलौर की मंडी में हानिकारक रसायन का प्रयोग किया जा रहा है। इससे केले का स्वाद तो प्रभावित हो ही रहा है, साथ ही सेहत को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। बावजूद अधिकारी इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
क्षेत्र की मंडी में बड़े पैमाने पर दूसरे शहरों में पके हुए केले की सप्लाई की जाती है। इसके लिए कच्चे केले को जल्दी पकाने के लिए जो तरकीब अपनाई जा रही है उससे केले के पौष्टिक गुण प्रभावित होने के साथ ही उसका सेवन करने वालों की सेहत से भी खिलवाड़ हो रहा है।
केले को पकाने के लिए इथरेल नामक रसायन का इस्तेमाल किया जा रहा है। एक बडे़ टब में पानी लेकर उसमें इथरेल को इसमें मिलाया जाता है। इसके बाद इस घोल में केले के गुच्छों को डुबो कर तुरंत बाहर निकाल लिया जाता हैं। इसके बाद केले को बर्फ में लगा कर छोड़ दिया जाता है। केले को अधिक पकने से बचाने के लिए इसे बावस्टीन नामक रसायन के संपर्क में रखा जाता है।
डाक्टरों की मानें तो इन रसायनों से गुर्दे, लीवर, आंत और शरीर के अन्य महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंच सकता है। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र प्रभारी डा. पीके सिंह का कहना है कि रसायनों के जरिये पके केले या किसी भी फल को खाने से बीमार होने का खतरा बना रहता है।
पहले भट्टी विधि से पकाया जाता था केला
केले को पकाने के लिए उसे एक कमरे में रखकर वहां बनी भट्टी में आग जला दी जाती थी धीमी आंच लगने से केला अच्छी तरह से पक जाता था। इससे केले के गुण भी बरकरार रहते थे। इस विधि से समय अधिक लगता था इस लिये अब इसका प्रयोग बंद कर दिया गया है।