नगर निगम पार्षदों की महत्वद्मकांक्षी खोखा योजना फ्लॉप हो गई है। पार्षदों ने रेलवे रोड पर आरती होटल के सामने से देवपुरा तिराहे तक सड़क किनारे नाले पर 271 दुकानों का खोखा बाजार बनाने की योजना बनाई थी। नगर निगम बोर्ड से इसका प्रस्ताव भी पारित करा लिया गया था। महापौर मनोज गर्ग भी पार्षदों के साथ थे। नगर आयुक्त ने बोर्ड के प्रस्ताव के क्रियान्वित कराने के लिए खोखा बाजार का नक्शा भी बना दिया था। लेकिन पीडब्ल्यूडी ने इसकी अनमति नहीं दी। इससे पार्षदों की योजना पर ब्रेक लगा दिया है।
वर्ष 2010 मे प्रशासन ने रेलवे रोड से खोखा मार्केट को हटवा दिया था। तब से दुकानदारों को विकल्प के रूप में दुकानें देने की बात की जा रही है। अब पार्षदों की खोखा योजना भी सिरे नहीं चढ़ सकी है। नगर आयुक्त विप्रा त्रिवेदी ने शुक्रवार को मिलने गए पार्षदों को इसकी जानकारी दी है। प्रत्येक खोखा दुकानदार को नगर निगम को 500 रुपये प्रतिमाह के हिसाब से किराया देना था। एक-एक पार्षद ने कई-कई खोखे लगाने की योजना बना रखी थी। पार्षदों की खोखा मार्केट में चित्रा टाकीज के सामने से उजाड़े गए करीब एक सौ उन खोखा दुकानदारों को भी अस्थायी रूप से समायोजित किया जाना था, जिनके पक्ष में सुप्रीमकोर्ट ने स्थायी विकल्प देने का आदेश नगर निगम को दे रखा है।
जिला प्रशासन ने चित्रा टाकीज के सामने रेलवे रोड के नाले से 2010 में अतिक्रमण हटाओ अभियान में खोखा दुकानदारों को बलपूर्वक हटा दिया है और जिन्हें अब तक स्थायी विकल्प नहीं मिल पाया है।
जेल जाने की नौबत
सुप्रीमकोर्ट के आदेशानुसार चित्रा टाकीज के सामने से हटाए गए खोखा दुकानदारों को स्थायी विकल्प नहीं देने पर महापौर मनोज गर्ग और नगर आयुक्त के जेल जाने की नौबत आ गई है। परेशान नगर आयुक्त ने शुक्रवार को कई पार्षदों से बातकर समाधान का रास्ता निकालने को लेकर बात की है। नगर आयुक्त ने बताया कि खोखा दुकानदारों की ओर से सुप्रीमकोर्ट के वकील का 15 दिन के अंदर विकल्प उपलब्ध नहीं कराने पर अवमानना याचिका सुप्रीमकोर्ट में दाखिल करने की चेतावनी का नोटिस प्राप्त हो गया है। नगर निगम की ओर सुप्रीमकोर्ट में स्थायी विकल्प देने का शपथ-पत्र दाखिल है। तीन महीने में चित्रा टाकीज के सामने से हटाए गए खोखा दुकानदारों को स्थायी विकल्प के तौर पर दुकानें बनाकर दी जानी थी।
मजबूर किया जा रहा है
लघु व्यापारी सेवा समिति के अध्यक्ष चोखेलाल का कहना है कि नगर निगम के अधिकारी सुप्रीमकोर्ट में अवमानना वाद दाखिल करने के लिए मजबूर कर रहे हैं। नगर आयुक्त बार-बार वादा कर मुकर जाती हैं। न स्थायी विकल्प दिया जा रहा है हैं और न स्थायी विकल्प मिलने तक अस्थायी विकल्प उपलब्ध कराया जा रहा है। मजबूरी में सुप्रीमकोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल करने का निर्णय लेना पड़ा है। याचिका दाखिल करने से पहले 15 दिन का कानूनी नोटिस दिया गया है।