हरिद्वार। सदानंद तत्वज्ञान परिषद की ओर से श्रीहरि द्वार आश्रम रानीपुर मोड़ पर चल रहे सत्संग में महात्मा दीपक दास ने कहा कि सांचे गुरु के तलाश में किसी भी व्यक्ति को चाहे जितने भी गुरु बदलने पड़े तो भी बिना किसी संकोच के बदलते रहना चाहिए।
सांचे गुरु के ज्ञान में झांकने से चार अक्षर वाला विराट पुरुष भगवान सामने ही साक्षात दिखाई देता है और उस भगवान से मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध तत्क्षण प्राप्त होता है। किसी भी मानव के लिए जीतेजी अमरत्त्व को प्राप्त कर लेना ही अपने जीवन को सफल-सार्थक बना लेना है। यदि गुरु के ज्ञान से ऐसी उपलब्धि नहीं मिली है तो जिज्ञासु को यह समझ लेना चाहिए कि वह गुरु सांचा गुरु नहीं है।
कहा कि किसी भी जिज्ञासु के जीवन का उद्देश्य है भगवान को पाना न कि गुरु को पाना। भगवान के मिलने पर ही मुक्ति-अमरता का साक्षात् बोध प्राप्त होता है, इसलिए किसी भी सच्चे जिज्ञासु को गुरु में नहीं चिपकना चाहिए। उस ‘एक’ भगवान को खोजने में सच्चा गुरु भी मिल जाएगा, लेकिन, गुरु मात्र में चिपके रहने पर भगवान तो मिलेगा ही नहीं, सच्चा गुरु भी नहीं और मोक्ष भी नहीं मिलेगा।