अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
शांतिकुंज कि प्रमुख डा. प्रणव पंड्या ने कहा कि आध्यात्म का पर्याय है संस्कृति। आध्यात्म मनुष्य के अंदर नवोन्मेष, जागृति पैदा करती है। आध्यात्म मनुष्य के जीवन में श्रेष्ठताओं, सत्प्रवृत्तियों श्रेष्ठ गुणों को उतारने की कला का नाम है।
शुक्रवार को शांतिकुंज के मुख्य सभागार में आयोजित शिक्षक गरिमा शिविर में गुजरात और दक्षिण भारत से आए शिक्षकों और सृजन शिल्पी युवाओं को संबोधित करते हुए डा. पंड्या ने कहा कि संस्कृति वह है जो हमारे संस्कारों को पल्लवित करती है। हमें संस्कारवान बनाती है। संस्कृति मनुष्य को मानसिक शांति और सुख प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति से श्रेष्ठ संस्कारों का निर्माण करना है। भारतीय संस्कृति ही विश्व का नवनिर्माण कर सकती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के माध्यम से बाल्यकाल से ही संस्कृति बीजारोपण करना श्रेष्ठतम कार्य है।
महात्मा गांधी और शांतिकुंज के संस्थपक श्रीराम शर्मा आचार्य आदि महापुरुषों ने अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन कर ही समाज को नई दिशा देने में कामयाब हो पाए थे। उन्होंने कहा कि परिवार, समाज को सभ्य और सुसंस्कृत बनाना हो तो संस्कार के साथ स्वच्छता का भी ध्यान रखना होगा। स्वच्छता से ही तन- मन पवित्र रहता है।
दूसरे सत्र में देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुुलपति डा चिन्मय पंड्या ने कहा कि आज जिस तरह की विपदाएं हैं उनसे निजात पाने के लिए प्राकृतिक रूप से समाधान खोजने की जरूरत है। व्यवस्थापक शिव प्रसाद मिश्र ने कहा कि भारतीय संस्कृति विश्व की महान संस्कृति है। इससे ही विश्व का कल्याण संभव है।
भारतीय संस्कृति ज्ञान परीक्षा के समन्वयक प्रदीप दीक्षित ने बताया कि दो दिन तक चले इस शिविर में गुजरात प्रांत के सैकड़ों शिक्षक और संस्कृतिकर्मी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि नौ सत्रों में प्रतिभागियों को सहकार और सहयोग के साथ सफलता के विविध पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी गई । प्रतिभागियों का कालीचरण शर्मा, कुलसचिव संदीप कुमार, जेपी वर्मा, दिनेश पटेल आदि विशेषज्ञों ने अलग-अलग विषयों पर संबोधन किया। इस अवसर पर डा. ओपी शर्मा, डा. बृजमोहन गौड़, केदार प्रसाद दुबे आदि उपस्थित रहे।