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50 हजार हेक्टेयर फसल पर संकट

Wed, 03 Feb 2016 12:12 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
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हरिद्वार। सर्दी का मौसम खत्म होने को है और अभी तक एक बूंद पानी नहीं बरसा। बारिश नहीं होने से जिले में 50 हजार हेक्टेयर से ज्यादा फसल प्रभावित होने की आशंका है। ऐसे में किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा होने वाला है। फसल की लागत बढ़ेगी और उत्पादन गिरेगा। पिछले साल बेमौसम बारिश की मार से किसान उबर भी नहीं पाए थे कि फिर मुसीबत खड़ी हो गई है।
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पिछले साल मार्च और अप्रैल में हुई भारी बारिश किसानों के लिए बड़ी परेशानी लेकर आई थी। खेतों में पकी गेहूं की फसल को भारी नुकसान पहुंचा था। इस दौरान कई किसानों ने अपनी फसल को खेत में ही जला दिया था। तब से अब तक जिले में अधिकतर किसान बरबाद हुई  फसलों का मुआवजा मांगते आ रहे हैं। हरिद्वार, लक्सर, रुड़की और भगवानपुर चारों तहसीलों में अधिकतर किसानों को अभी तक मुआवजे की धनराशि मिल ही नहीं सकी। किसान इस दर्द से उबर पाते मौसम ने उन्हें एक बार फिर से झटका दे दिया। सामान्यत: दिसंबर में बारिश की उम्मीद जताई जा रही थी। जिससे गेहूं और गन्ने समेत अन्य फसलों को काफी लाभ होता। लेकिन बारिश न होने के कारण ये फसलें बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। किसानों को फसल बचाने के लिए ट्यूबवेलों से ज्यादा सिंचाई करनी पड़ रही है। जिससे किसानों का खर्चा बढ़ रहा है।
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ये फसलें हो रही हैं प्रभावित
बारिश नहीं होने का असर सबसे अधिक वैसे तो गेहूं की फसल पर पड़ा है। लेकिन मसूर, चना, मटर, सरसों, राई, आलू, टमाटर, प्याज और जौ पर भी प्रभाव साफ देखने में आ रहा है।
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घाड़ क्षेत्र के इलाके ज्यादा प्रभावित
शिवालिक पर्वत की तलहटी में बसा रोशनाबाद हेत्तमपुर से बेहट तक का इलाका घाड़ में गिना जाता है। इस क्षेत्र में नहर से सिंचाई की सुविधा नहीं है। सरकारी और निजी टयूबवेल से फसलों में सिंचाई की जा रही है। परंतु इसमें भी वे स्थान फसलों की लिहाज से ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। जहां ट्यूबवेल आदि उपलब्ध नहीं है। यहां किसान आसमान के भरोसे रहता है। इनमें आन्नेकी, औरंगाबाद, टीहरा, डालूवाला, रसूलपुर, बुग्गावाला और ग्रंट आदि गांव शामिल हैं।
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विशेषज्ञों का माना स्थिति चिंताजनक
धनौरी कृषि विज्ञान केंद्र के प्रभारी डा. पुरुषोत्तम कुमार का कहना है कि इस मौसम में बारिश नहीं होना गेहूं, गन्ना मटर और चना जैसी फसलाें के लिए नुकसान दायक है। मसूर जैसी फसलें तो पूरी तरह ही खराब हो जाएंगी। उन्होंने बताया कि जिन क्षेत्रों में सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं वहां इनकी उत्पादन लागत ज्यादा बढ़ जाएगी। उनके अनुसार गन्ने का उत्पादन करीब सात से आठ हजार प्रति बीघा की लागत आती है। यह बढ़कर 12 से 13 हजार रुपये प्रति बीघा बढ़ जाएगी, जबकि गेहूं पर प्रति बीघा दस से ढाई हजार की लागत आती है जो सिंचाई का खर्च बढ़ने के कारण अब करीब तीन हजार रुपये बीघा हो सकती है।
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 जहां सिंचित क्षेत्र है वहां फसल के उत्पादन का खर्च करीब 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ने का भी अनुमान है। उन्होंने बताया कि अभी पूरी तरह सूखे की स्थिति नहीं बनी है लेकिन जिस तरह से फसलें प्रभावित हो रही हैं उसे देखते हुए प्रशासन एहतियात बरत रहा है।
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 -जेपी तिवारी, जिला कृषि अधिकारी
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