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विकास के पैसे का ब्याज बना रहा है नगर निगम

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रतनमणी डोभाल
हरिद्वार।
एक तरफ शहरवासी विकास कार्यों के लिए नगर निगम अधिकारियों, पार्षदों व मेयर के चक्कर काटते रहते हैं,वहीं दूसरी ओर आलम यह है कि शासन से प्राप्त विभिन्न विकास योजना के पैसे को बैंकों में एफडीआर बनाकर ब्याज बनाया जा रहा है। जबकि अधिकारी से लेकर जनप्रतिनिधि तक बजट का रोना रोते रहते हैं।
शासन से प्राप्त विभिन्न विकास योजनाओं की धनराशि को विकास कार्यों पर खर्च करने के बजाय उसकी एफडीआर बनाकर नगर निगम प्रशासन लाखों की कमाई कर रहा है। यह सिलसिला नगर पालिका परिषद के समय से जारी है। नगर निगम अवस्थापना निधि, मलिन बस्ती सुधार योजना और हरिद्वार का पोर्टल बनाने के लिए प्राप्त लाखों रुपये को खर्च नहीं किया और बैंक में एफडीआर बना दी। एफडीआर के रूप में जमा विकास योजनाओं की धनराशि पर बैंक की ओर से देय ब्याज लगाकर मूल धनराशि बढ़कर 31 मार्च 2017 तक 3.30 करोड़ रुपये हो गई है। नगर निगम की लेखा परीक्षा जांच करने वाले अधिकारियों ने लेखा-अभिलेखों की जांच में इस गड़बड़ी का खुलासा किया है। उन्होंने जांच में आख्या में कहा कि शासन की ओर से स्वीकृत एवं धनराशि निर्गत करने के बाद प्रभावी कार्ययोजना के अभाव में धनराशि का उपयोग नहीं किया गया तथा योजना का लाभ जन सामान्य को नहीं मिल पाया है।
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इन योजना राशियों की बनाई एफडीआर
- नगर निगम (नगरपालिका) के पास अवस्थापना निधि के अंतर्गत मार्च 2005 तक 75 लाख 53 हजार 961 रुपये थे। अधिकारियों ने आय बढ़ाने के स्थायी योजना पर इसको खर्च करने के बजाय 75 लाख 50 हजार रुपये की पंजाब नेशनल बैंक में एफडीआर बना दी। जिसका समय-समय नवीनीकरण कराया जा रहा है और मार्च 2017 तक यह राशि मयब्याज एक करोड़ 58 लाख 84 हजार 465 रुपये हो गई है।
- मलिन बस्ती योजना में मई 2006 तक 38 लाख 26 हजार 704 रुपये थे। जिसमें से 38 लाख रुपये की पीएनबी में एफडीआर बनाई। मलिन बस्ती योजना की राशि को खर्च नहीं करने से यह बढ़कर मार्च 2017 तक 67 लाख 83 हजार 878 रुपये हो गई है।
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- शासन ने हरिद्वार पोर्टल बनाने के मद में वर्ष 2006 में 60 लाख रुपये निर्गत किए थे। पोर्टल बनाने के बजाय अधिकारियों ने इस राशि की 15-15 लाख रुपये की इलाहबाद बैंक में चार एफडीआर बनाकर जमा करा दी। जिससे 60 लाख रुपये की पोर्टल की धनराशि बढ़कर एक करोड़ तीन लाख 38 हजार 208 रुपये हो गई है।
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