ब्यूरो/अमर उजाला, हरिद्वार
वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना में अपात्र लोगों को करोड़ों का ऋण स्वीकृत करने वाली चयन समिति के सदस्यों के खिलाफ पुलिस को मुकदमा दर्ज करने के निचली अदालत के आदेश पर रोक लगवाने के लिए उत्तराखंड सरकार की ओर से दाखिल याचिका को तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश वरुण कुमार ने खारिज कर दिया है। विद्वान न्यायाधीश ने निचली अदालत की ओर से 19 जनवरी को पारित आदेश, जिसमें पुलिस को मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया गया था की पुष्टि की है।
योजना में अपात्र लोगों को ऋण दिए जाने का खुलासा सूचना का अधिकार के तहत पर्यटन विभाग की ओर से दी गई प्रमाणित सूचना से हुआ था। इन्हीं सूचनाओं के आधार पर अधिवक्ता अरुण कुमार भदौरिया ने जिल स्तरीय चयन समिति के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराने के लिए वर्ष 2011 में याचिका अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में दाखिल की थी। 19 जनवरी 2019 को कोर्ट ने पुलिस को समुचित धाराओं में मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ उत्तराखंड सरकार की ओर से जिला शासकीय अधिवक्ता फौजदारी इंद्रपाल बेदी और एडीजीसी अनिल राणा ने न्यायालय तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश के समक्ष याचिका दायर की थी, जिसको खारिज कर दिया गया है। याची अरुण भदौरिया ने बताया कि उन्होंने न्यायालय के आदेश से रानीपुर कोतवाली प्रभारी निरीक्षक को मोबाइल फोन के मैसेज के जरिये भी अवगत करा दिया है।
आयकर दाता और बड़े व्यवसायियों को दे दिया था ऋण
उत्तराखंड सरकार ने राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने और स्थानीय बेरोजगारों को स्वरोजगार देने के लिए वर्ष 2003-04 में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली पर्यटन स्वरोजगार योजना शुरू की गई थी। इस योजना में वर्ष 2011 तक हरिद्वार जिले में 252 लोगों को करोड़ों रुपये का ऋण दिया गया है। इन लाभार्थियों में कई आयकर दाता, बड़े व्यवसायी और राजनीतिक रसूखदार शामिल हैं। जबकि नियमानुसार उन्हीं लोगों को ऋण दिया जाना था जो आवेदन की तिथि तक बेरोजगार होने, स्थायी निवास और वार्षिक आय से संबंधित शपथपत्र दाखिल करते। योजना के तहत ऋण स्वीकृत करने के लिए जिला स्तर पर चयन समिति बनी थी। जिलाधिकारी की अध्यक्षता में बनी समिति में मुख्य विकास अधिकारी, लीड बैंक अधिकारी, जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक, पर्यटन विकास विभाग और परिवहन विभाग के अधिकारी शामिल थे। समिति ने ही अपात्र और आयकर दाता, राजनीतिक रसूखदारों को करोड़ों रुपये का ऋण झूठे शपथपत्रों के आधार पर स्वीकृत किया था। शहर के एक बड़े होटल व्यवसायी के परिवार के चार लोगों को ही बेरोजगार बताकर एक करोड़ से अधिक का ऋण दिया गया ।