अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
भारतीय धरोहर पाठक मंडल की ओर से प्राचीन भारत में विज्ञान एवं तकनीकी विषय पर प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी डा. ओमप्रकाश पांडेय ने कहा कि भारत की समृद्ध विरासत विज्ञान और तकनीकी की निरंतर उपेक्षा की जा रही है। इसका कारण हमारी मानसिक गुलामी है।
उन्होंने कहा कि न्यूटन से 500 वर्ष पहले भाष्कराचार्य ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रतिपादित किया था। ईसा से 6000 वर्ष पूर्व कणाद ऋषि ने कण के वैज्ञानिक सिद्धांत को प्रतिपादित कर गुरुत्वाकर्षण का नियम बनाया था। पाश्चात्य विज्ञानी कापरनिकस ने जहां पृथ्वी को गोल बताकर चर्च और पादरियों का विरोध झेला, वहीं हमारे ऋगवेद ने हजारों साल पहले पृथ्वी को चक्र जैसा गोल बताया था। कहा कि ऋग्वेद ने सप्त रंगों का प्रतिपादन किया है तथा शून्य यजुर्वेद की देन है, जिसे आर्यभट्ट प्रयोग में लाए थे। डा. पांडेय ने कहा कि भारत की समृद्ध ज्ञान विज्ञान तकनीक का पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने केवल अंग्रेजी में अनुवाद ही किया है अंकगणित, बीजगणित और ज्यामीतिय भारत से ही अरब होते हुए पाश्चात्य देशों तक पहुंची है और इसके प्रमाण भी है। विमल कुमार ने बताया कि भारत सांस्कृतिक विरासत का संपन्न देश है। यहां ऋषि मुनियों ने वेदों की रचना कर वर्तमान में पाश्चात्य देशों ने विज्ञान के क्षेत्र में जो उपलब्धियां प्राप्त की है उसे आधार प्रदान किया। इस कारण हमें अपनी प्राचीन संस्कृति पर गर्व करना चाहिए।
डा. अजय मगन ने बताया कि कॉस्मिक एनर्जी से हेल्थ, वेल्थ और हैप्पीनेस सब हासिल की जा सकती है जो हमारे शरीर में ही समाहित रहती है। पूर्व कुलपति डॉ. महावीर प्रसाद अग्रवाल ने कहा कि भार
त विश्व गुरु था और अपने प्राचीन वैभव को विस्मृत करने के कारण ही पाश्चात्य चकाचौंध से प्रभावित हो रहा है। संगोष्ठी में भागवताचार्य शास्त्री, रमेश उपाध्याय, श्रवण गुप्ता, उमेश श्रीवास्तव, नरेश मनचंदा, गौरव शर्मा, संजय वर्मा, डा. अश्विनी चौहान, सुदीप बनर्जी, मधुसूदन अग्रवाल उपस्थित रहे। संगोष्ठी की अध्यक्षता पूर्व कुलपति डा. महावीर प्रसाद अग्रवाल तथा संचालन विमल कुमार ने किया।