अवैज्ञानिक तरीके से दिए गए अपने बयान के बाद सुर्खियों में आए उत्तराखंड के प्रमुख सचिव राकेश शर्मा को पर्यावरणविदों ने आड़े हाथों लिया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि शर्मा बिना जानकारी ही बोल रहे हैं, जबकि उन्हें नदी के विज्ञान की एबीसी भी नहीं मालूम।
तबाही के लिए चुगान की अनुमति न मिलने को जिम्मेदार ठहराने संबंधी प्रमुख सचिव के बयान पर उबाल आ गया है। पर्यावरणविदों का कहना है कि जो ऐसी बात कह रहा है, साफ लगता है कि उसे नदी के विज्ञान की जानकारी नहीं है।
इस क्षेत्र में खनन नहीं होता और चुगान भी नहीं। तबाही की वजह पहाड़ पर हो रही माइनिंग थी। इसके साथ ही विभिन्न परियोजनाओं से सीधे नदियों में गिरने वाले मलबे से नुकसान की मात्रा अत्यधिक रही।
क्या कहते हैं पर्यावरणविदः
'जिन क्षेत्रों में तबाही आई है, वहां खनन नहीं होता। चुगान के लिए वन एवं पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति से भी कुछ नहीं हो सकता था, क्योंकि यहां तो माइनिंग हो रही थी। ट्रकों की लाइन लगी थी। नदी में से रेत निकाली जा रही थी। बता दूं कि नदी से रेत निकालने पर उसकी ढाल बढ़ जाती है। बारिश ज्यादा होती है। पानी ज्यादा आता हैऔर तेजी से बहता है। ऐसे में क्षरण बढ़ जाता है, जो नुकसान का कारण बनता है। चुगान की अनुमति न मिलने से तबाही आने की बात कहने वालों को नदियों के विज्ञान की जानकारी नहीं है।'
रवि चोपड़ा, पूर्व सदस्य, नेशनल रिवर गंगा बेसिन अथारिटी
'इस तबाही का लेना-देना न तो खनन से है और न ही चुगान से। दरअसल, नदी में मिट्टी आ रही है। टनल का मलबा आ रहा है। अतिवृष्टि से नदियों का स्तर बढ़ गया और कमजोर इलाके इससे चौपट हो गए। लामबगड़ के पास विष्णु प्रयाग परियोजना के मलबे से जीएमवीएन का गेस्ट हाउस क्षतिग्रस्त हो गया। पांडुकेश्वर, गोविंदघाट में बाढ़ आई। इससे पहले अलकनंदा, भागीरथी आदि नदियों में बाढ़ आती थी। इससे किनारों पर बालू एकत्र हो गई। लोगों ने इसमें मकान बना लिए। इस बार बारिश ज्यादा हुई तो नुकसान हो गया।'
चंडी प्रसाद भट्ट, प्रख्यात पर्यावरणविद्
यह बोले थे राकेश शर्माः
यहां खनन नहीं होता। चुगान कर नदी में आए पत्थर, बोल्डर और रेत निकाले जाते हैं, ताकि नदी का फैलाव कम रहेऔर धाराएं दिशा बदल आबादी को नुकसान न पहुंचाए। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के चुगान की मंजूरी न देने से नदियां उफना गईं। इसी से भारी तबाही हुई। चुगान विरोधी पर्यावरणविदों को भी यह परेशानी समझनी होगी।