तीन बहादुर बेटियों ने केदारनाथ आपदा में भाई तो गंवाया मगर हाथों से मिट्टी खोद-खोदकर मलबे में दबे अपने पिता को जिंदा निकाल लिया।
इस दौरान पास में खड़ा पुलिसकर्मी थोड़ी देर तमाशा देखता रहा। बेटियों ने पिता को बाहर निकालकर देखा तो बगल में रखी पैंट से रुपये गायब थे और पुलिसकर्मी नदारद।
जौनपुर यूपी से 16 जून को उपाध्याय परिवार गौरीकुंड से ऊपर केदारनाथ रवाना हुआ। दो किमी चढ़ाई चढ़ी थी कि गलचट्टी के पास तेज बारिश शुरू हो गई। उपाध्याय परिवार के आगे पीछे तकरीबन 200 लोग इस दौरान केदारनाथ की चढ़ाई चढ़ रहे थे।
बारिश तेज हुई तो लोग रास्ते पर खाली झोपडिय़ों में घुस गए। नेहा बताती है कि पंद्रह मिनट बाद ही इतने में पहाड़ी से एक झटके में पत्थर गिर गए। झोपडिय़ों में रुके लोग बारिश में ही भागने लगे।
अफरा-तफरी के बाद जब लोगों ने अपने परिजनों की खोजबीन शुरू की तो पता चला तकरीबन 40 लोग मलबे में दब गए। दबे लोगों में नेहा के पिता शिव प्रसाद उपाध्याय और 20 वर्षीय भाई उत्कर्ष भी थे।
पिता और भाई को दबा देख नेहा और उसकी बहनें, विभा और भावना ने हाथों से ही मिट्टी खोदना शुरू कर दिया। तकरीबन 7 घंटे की मशक्कत के बाद तीनों ने पिता को मलबे से बाहर निकाल लिया। फिर भाई को ढूंढने लगीं।
इस दौरान एक पुलिसकर्मी वहां से गुजरा लेकिन तमाशा देखता रहा। रात ज्यादा हो गई। मोबाइल की रोशनी में रात के करीब 2 बजे भाई का शरीर तो मिला लेकिन बेजान। शिव प्रसाद की पैंट से साढ़े बारह हजार रुपये गायब थे।
जख्मी पिता और तीनों बेटियां भाई के शव के पास ही रातभर मदद के इंतजार में बैठे रहे। सुबह सबसे पहले पिता ने अपनी बेटियों को हौसला देते हुए बुझे मन से बेटे उत्कर्ष को मंदाकिनी में धकेलने को कह दिया।
तीनों अपलक अपने भाई को तब तक निहारती रहीं जब तक वह मंदाकिनी की धारा में ओझल नहीं हो गया। 5वें दिन जब सेना आई तो शिवप्रसाद को उनकी बेटियों ने राहत शिविर में भेज दिया और खुद रेस्क्यू का इंतजार करती रही।
उन्हें पिता को बचाने का सुकून जरूर है लेकिन भाई को ना बचा पाने का दुख भी।